Thursday, December 29, 2016

क्योकि जिंदगी जीने का भी एक सलीका होता है.

क्योकि जिंदगी जीने का भी एक सलीका होता है.

बहुत पहले नेपोलियन ने कहा था , अगर हम राजा नहीं है तो हम सिर्फ गुलाम हो सकते है.  यहाँ राजा का मतलब उस राजा से नहीं है जो हम अब तक देखते सुनते आये हैं. यहाँ राजा का मतलब हम से है. हम मतलब हम और कुछ भी नहीं.

एक कहानी सुनिये..

एक थे बख्त मियाँ. मिज़ाज़ से बिलकुल सादे. तबियत से मस्तमौला. जिंदगी सुकून से कट रही थी. एक दिन  दोस्तों की संगत में मस्ती करने की सूझी. चढ़ा आये गले तक शराब. जब नशा उतरा तो बुरा एहसास हुआ लेकिन इस एहसास पर  नशे का मज़ा भारी पड़ गया. फिर सिलसिला चल पड़ा मस्ती का. सिलसिला चलता रहा. धीरे धीरे जुआ खेलना शुरू कर दिया.  शुरू में हारे तो बुरा लगा लेकिन दो तीन बार जीतने के बाद जुए की भी लत पड़ गयी. एक दिन बाज़ी अच्छी खेली तो " चाल " पर हो आये. फिर वेश्यागमन भी लत में शामिल हो गया. अब जैसे जैसे समय बीतता गया बख्त मियां घर , परिवार , दोस्त , यार , रिश्तेदार सब के लिए कम्बख्त मियां बनते चले गए. लेकिन  बख्त मियां ने कभी परवाह नहीं की. बल्कि भरी महफ़िल में अपनी तशरीफ़ की नुमाइश करते हुए हुए एलान करते रहे कि हम दुनिया को इसके नीचे दबा के रखते हैं.

अंत में एक दिन ऐसा आया जब बख्त मियां की जिंदगी में सब कुछ पीछे छूट गया. बचे तो सिर्फ अकेले बख्त मियां.

अब बख्त मियां क्या करते ? बैठकर सोचने लगे. सोचते सोचते उस पहले जाम तक पहुँचे. याद आते ही खूब रोये. फूट फूट कर रोये. जिंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि बह जाना और बस बहते ही चले जाना कितना गलत होता है. बेचारे हर आंसू के साथ अपनी आदतों को कोसते रहे. जब कुछ न समझ आया तो चीख पड़े , " या अल्लाह , मैं कैसे अपनी आदतों का गुलाम बन गया. मुझ पर रहम फरमा. मुझे रिहाई अता कर. "
अल्लाह ने शायद सुन ली.
अगले दिन उनकी लाश दरिया में मिली.

अब सोचो. ये कहानी क्यों सुनाई ?
क्योकि बख्त मियाँ राजा नहीं बन पाए. खुद की हुकूमत नहीं सम्हाल पाये . गुलाम बन गए अपनी बुरी  आदतों के.

बख्त मियां की तरह हम भी अक्सर गुलाम बन जाते हैं. बख्त मियां से कम्बख्त मियां हो जाते है और किसी  दिन कहाँ गुम हो जाते हैं , पता ही नहीं चलता.
तब बस दो ही रास्ते बचते है , या तो बख्त मियां की तरह एक दिन गुलामी में गुम हो जाएँ या फिर अपने ही खिलाफ बगावत कर दें. पहला रास्ता बेहद आसान है. कोई तकलीफ नहीं होती.  दूसरा वाला थोड़ा मुश्किल है. वो इसलिए क्योंकि बगैर सोचे समझे बगावत करनी होती है  , तकलीफ से गुजरना पड़ता है  ,  नुकसान उठाना पड़ता है.

और अगर इतना हो गया तो जरूर जीतोगे. कम्बख्त से फिर बख्त मियाँ बन सकोगे.

सनद रहे , अगर हम राजा नहीं हैं  तो सिर्फ गुलाम हो सकते हैं.