हुआ यूँ कि हम बड़ी गफलत में थे कि हम बड़े अच्छे इंसान है. एक एक कर हमारी अच्छाई का फायदा उठाया गया. हमें बार बार ठगा गया और अगली बार जब भी हमें ठगना था उससे पहले हमें और अच्छा इंसान घोषित किया गया. हम खुश होते रहे कि हम बड़े अच्छे इंसान है. लेकिन अच्छे इंसान की छवि में जो दर्द मिला वो बयां नहीं कर सकते. उसके आगे अच्छे होने की ख़ुशी कुछ नहीं थी. हमें अच्छे होने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. हम इस अच्छाई से ऐसे चिपके थे कि जब भी छूटने की कोशिश करते , बड़ा दर्द होता था.
पर अंततः इस दर्द से सामना हुआ और अब हम मुक्त हैं.
अब हमारा एक ही उसूल है कि हमारा कोई उसूल नहीं है.
मुद्दे पर आते हैं.
एक दिन हमने सोचा कि क्यों न वही व्यवहार उन लोगों के साथ किया जाए जो हमारे साथ होता रहा लेकिन हम अपनी अच्छाई के चक्कर में बहुत आसानी से वो सब सहन करते रहे. " आई एम सॉरी " क्या आपको बुरा लगा के जवाब में खींस निपोरे "इट्स ओके " बोलते रहें.
क्या वह लोग उसका दसवा हिस्सा भी सहन करने लायक थे ? अगर वह सहन करने लायक नहीं थे तो हम अब तक उनके साथ क्या कर रहे थे ? अच्छे बनकर इस्तेमाल हो रहे थे या हमें बेहया समझ लिया गया था कि हम कुछ भी सहन करते रहेंगे ? कि हमने सब कुछ सहन करने का ठेका ले रखा था ? कि हमारा जन्म ही जलालत , फ़ज़ीहत , धूर्तता आदि सहन करने के लिए हुआ.
तो हमने एक दिन तंग आकर वही व्यवहार किया जो रोज-ब-रोज हमारे साथ होता आ रहा था. मन तो नहीं हो रहा था लेकिन दिल पर पथ्थर रख लिया. एक दिन के लिए हम बुरे बन गए. उतने बुरे नहीं जितने लोग हमारे साथ रहे. यूं समझिए कि उनके आधे के आधे के आधे का आधा. अब बुरा मतलब तो बुरा होता है लेकिन हम उतने ही बने जितना की जरूरी था. जितने से हम समझ सके कि बुरे होने पर हमारी प्रतिक्रिया और लोगों की प्रतिक्रिया में कितना फर्क है.
फिर तो भैया जो थुक्का- फजीहत हुई कि हम बयाँ नहीं कर सकते. आश्चर्य हुआ कि लोग हमें उसे स्तर पर बिल्कुल भी झेलने को तैयार नहीं जिसका सैकड़ो गुना अधिक वो हमें झेला चुके हैं. लोग झेलाने के आदती है और हम झेलने के.
सच तो ये है कि हम झेल - झेल के झेलुवा हो गए थे. कई बार जेहन में आया कि अब अपना उपनाम रख लें " झेलुवा" . प्रद्युम्न झेलुवा. कसम से जितना हमने सहा उतना अगर हम बदले में कर दें तो भद्रजन सरेराह खंबा गाड़ के हमको वहीँ टांग दें.
लेकिन जो भी हुआ अच्छा हुआ. अब हम मौज में हैं. हमारी आँखे खुल गयी. इतने दिन तक नहाक ही हम झेलुवा बने रहे. कितने कमजोर रहे हम. यह जीना भी कोई जीना था , जहां बार बार अच्छाई के नाम पर थूक कर चाटने की नौबत आ जाए. ऐसी अच्छाई किस काम की जो आपको पतित बना दे. उफर परे ससुरी ये अच्छाई-फच्चाई.
हमको तो भैया सबक मिल चुका कि अच्छा उन्ही के साथ बनिए जो अच्छा बनने लायक हों. जो इतना माद्दा रखते हो कि आप कभी उन्ही की तरह व्यवहार करें तो आपको झेल सकें. जो कम से कम इस मान्यता में यकीन रखते हो कि ' हमें दुसरो के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा हम अपने लिए पसंद करते हैं ' . वरना प्रणाम कर के विदाई लीजिये. ये झेलूपन बहुत खराब बीमारी है. जिंदगी झंड कर देती है.
नमस्कार !