Friday, May 24, 2013

मशहूर ब्राजीलियन लेखक पाउलो कोएलो के संस्मरण से....

कोएलो लिखते हैं कि मैं रेलवे स्टेशन पर खड़ा अपने एक पब्लिशर के आने का इंतजार कर रहा था। मेरी नजर रेल की पटरियों पर पड़ी, जहां कुछ लोग उसकी मरम्मत कर रहे थे। अचानक एक सवाल दिमाग में दौड़ा। मैंने पास खड़े मजदूरों से पूछा, 'इन पटरियों के बीच दूरी कितनी होगी?' जवाब मिला 143.5 से.मी.।
पाउलो को यह दूरी कुछ अजीब सी लगी। न 150 से.मी., न 145 और न ही 144, आखिर 143.5 ही क्यों? उन्होंने मजदूर से फिर पूछा। इस पर उसने कहा, दरअसल ट्रेन के पहियों के बीच की दूरी इतनी ही होती है। लेकिन पाउलो ने तो इसे दूसरे ढंग से सोचा था। वह बोले, 'तुम्हें नहीं लगता इस दूरी की वजह से ट्रेन के पहियों के बीच की दूरी इतनी है।' स्टेशन वर्कर मुस्कुराया और बोला, 'चीजें ऐसी इसीलिए हैं, क्योंकि वे ऐसी ही हैं।'

यह जवाब पाउलो के दिमाग को शांत नहीं कर पाया। एक टाइम पास सवाल उनकी जिज्ञासा बन चुका था। उन्होंने कई किताबें देखीं, हजारों पन्ने पलटे। हालांकि इस कठिन खोजबीन से उन्होंने कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखी थी। पर आखिरकार जवाब कुछ ऐसा मिला - जब पहली टेन बनी तो उन्हीं टूल्स से बनी, जिनसे उस जमाने में दूसरी गाड़ियां-बग्गियां आदि बनती थीं और उन गाड़ियों के पहियों के बीच की दूरी 143.5 सेमी होती थी।

वह दूरी इतनी इसलिए रखी गई थी, क्योंकि पुरानी सड़कें इसी पैमाने के हिसाब से बनती थीं और यह मेजरमंट दिया था रोड बनाने वाले रोमनों ने। इस माप की वजह थी- लड़ाई में इस्तेमाल होने वाली घोड़ागाड़ी। दरअसल, अगल-बगल दौड़ने वाले घोड़े एक दूसरे के बीच इतनी ही दूरी लेते थे। संभव है कि इस दूरी को बहुत पहले कभी किसी रोमन एक्सपर्ट ने नापा हो और उसकी किस्मत से यह एक एक्सपर्ट माप बन गई, जिसका आज सारी दुनिया पालन करती है।

इस दूरी ने शायद कोई बहुत बड़ा अड़ंगा भी न डाला हो, इसलिए हर कोई इसे अपनाता गया। किसी ने इसे बदलने की कोशिश के बारे में सोचा भी होगा तो शायद इस पंक्ति ने उसे हरा दिया होगा - यह दूरी इतनी ही होती है और यही सही है।

पाउलो की इस रोचक कहानी का एक संदेश है - इसी तरह हमारी जिंदगी के रास्ते भी तय होते हैं। जीवन में कई चीजें बदलाव चाहती हैं, लेकिन यह सोच कि यही चला आ रहा है, हमें एक ही ढर्रे की जिंदगी जीने पर मजबूर करती है। बदलाव के लिए चाहिए हिम्मत - सोचने की और उस सोच पर अमल करने की।

तमाम वैज्ञानिकों, कलाकारों, लेखकों की हिम्मत का ही नतीजा है कि हम रोज एक बेहतर दुनिया में जी रहे होते हैं। लेकिन दुनिया में एक बड़ा हिस्सा वह है, जो यह हिम्मत नहीं कर पाता है। दसवीं के बाद हमारे पास मैथ्स छोड़ने का ऑप्शन होता है, लेकिन हम नहीं छोड़ते क्योंकि हमारे परिचित सीनियर्स ने ऐसा नहीं किया और न हमारे दोस्त ऐसा कर रहे हैं। हमें डर होता है कि ऐसा करने पर समाज की नजरों में हम कमजोर साबित हो जाएंगे। और इस वजह से हम उसे झेलते हैं - 2, 5, 7 साल या जिंदगी भर। क्या जरूरी है कि हम डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, साइंस, कॉमर्स या इकनॉमिक्स ही पढ़ें, क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि ऐसा सारी दुनिया सोचती है?

Wednesday, May 22, 2013

रेत की कहानी ..एक सूफी कथा।


      एक उछलता हुआ झरना रेगिस्‍तान पहुंचा। उसे दिखाई दिया कि वह उसे पार नहीं कर सकेगा। बारीक रेत में उसका पानी तेजी से सूख रहा था। झरने ने स्‍वयं से कहा, ‘’रेगिस्‍तान को पार करना मेरी नियति है लेकिन उसके आसार नजर नहीं आते है।
      यह शिष्‍य की स्‍थिति है जिसे सदगुरू की जरूरत होती है। लेकिन वह किसी पर श्रद्धा नहीं कर सकता। यह मनुष्‍य की दुखद हालत है।
      रेगिस्‍तान की आवाज ने कहा, ‘’हवा रेगिस्‍तान को पार करती है, तुम भी कर सकते हो।‘’
      झरना बोला, ‘’जब भी मैं कोशिश करता हूं मेरा पानी रेत में समा जाता है, और मैं कितना ही जोर लगाऊं थोड़ी दूर ही जा पाता हूं।
      हवा रेगिस्‍तान के साथ जोर नहीं लगाती।
   लेकिन हवा उड़ सकती है, मैं उड़ नहीं सकती।
      तुम गलत ढंग से सोच रही हो। अकेले उड़ने की कोशिश मूढ़ता है। हवा को तुम्‍हें ले जाने दो।
      झरने ने कहा कि वह अपनी निजता को खोना नहीं चाहता। इस तरह तो उसकी हस्‍ती खो जाएगी। रेत ने समझाया कि इस तरह सोचना तर्क का एक भाग है लेकिन यथार्थ के साथ उसका कोई ताल्‍लुक नहीं है। हवा जल की नमी को आत्‍म सात कर लेती है। रेगिस्‍तान के पार ले जाती है। और फिर बरसात बन कर पुन: नीचे ले आती है।
      झरना पूछता है, ‘’यदि ऐसा है तो क्‍या मैं यही झरना रहूंगा जो आज हूं।‘’
      रेत बोली; ‘’यों भी किसी सूरत में तुम यही नहीं रहोगे। तुम्‍हारे पास कोई चुनाव नहीं है। हवा तुम्‍हारे सार तत्‍व को, सूक्ष्‍म अंश को ले जाएगी। जब रेगिस्‍तान के पार, पहाड़ों में तुम फिर नदी बन जाओगे। फिर लोग तुम्‍हें किसी और नाम से पुकारेगा। लेकिन भीतर गहरे में तुम जानोंगे: ‘’मैं वहीं हूं।‘’
      हवा की स्‍वागत करती हुई बांहों में स्मारक झरना रेगिस्‍तान के पार चला गया। हवा उसे पर्वत की चोटी पर ले गई और फिर धीरे से, लेकिन दृढ़ता से जमीन पर गिरा दिया। झरना बुदबुदाया: ‘’अब मुझे मेरी वास्‍तविक अस्‍मिता का पता चला। फिर भी एक प्रश्न उसके मन में था। ‘’मैं अपने आप को क्‍यों नहीं जान सका।‘’ रेत को मुझे क्‍यों बताना पडा।
      एक छोटी सी आवाज उसके कानों में गूँजी। रेत का एक कण बोल रहा था: सिर्फ रेत ही जान सकती है क्‍योंकि उसने कई बार इसे घटते देखा है। क्‍योंकि वह नदी से लेकिर पर्वत तक फैली हुई है। जीवन की सरिता अपनी यात्रा कैसे करेगी इसका पूरा नक्‍श रेत में बना होता है।‘’

Tuesday, May 21, 2013

प्रेम..

जीवन को प्रेम से भरें ।आप कहेंगे, हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं, आप शायद ही प्रेम करते हों; आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। प्रेम करना और प्रेम चाहना, ये बड़ी अलग बातें हैं। हममें से अधिक लोग बच्चे ही रहकर मर जाते हैं। क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है। प्रेम करना बड़ी अदभुत बात है। प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है। छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं, परिवार उनको प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए, तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं, तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है, वह दुख झेलता है। क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता, प्रेम केवल किया जाता है। चाहने में पक्का नहीं है, मिलेगा या नहीं मिलेगा। और जिससे तुम चाह रहे हो, वह भी तुमसे चाहेगा। तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे। दुनिया में जितना पति-पत्नियों प्रेमी-प्रेमिका­ओ का संघर्ष है,

उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है।

इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आपकी आकांक्षा प्रेम चाहने की है हमेशा। चाहते हैं, कोई प्रेम करे। और जब कोई प्रेम करता है, तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है, वह दूसरा भी प्रेम करना केवल वैसे ही है जैसे कि कोई मछलियों को मारने वाला आटा फेंकता है। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है। वह आटा मछलियों को दे नहीं रहा है, वह मछलियों को चाहता है, इसलिए आटा फेंक रहा है।

इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखायी पड़ते हैं, वे केवल प्रेम पाना चाहने के लिए आटा फेंक रहे हैं। थोड़ी देर वे आटा खिलाएंगे, फिर...। और दूसरा व्यक्ति भी जो उनमें उत्सुक होगा, वह इसलिए उत्सुक होगा कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा। थोड़ी देर बाद पता चलेगा, वे दोनों भिखमंगे हैं और भूल में थे; एक-दूसरे को बादशाह समझ रहे थे! और थोड़ी देर बाद उनको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी। दुनिया में दाम्पत्य जीवनऔर उसके पूर्व का प्रेम सम्बन्ध नर्क बना हुआ है, क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं, देना कोई भी जानता नहीं है।

झगड़े का बुनियादी कारण -

सारे झगड़े के पीछे बुनियादी कारण इतना ही है। और कितना ही परिवर्तन हो, किसी तरह के विवाह हों, किसी तरह की समाज व्यवस्था बने, जब तक जो मैं कह रहा हूं अगर नहीं होगा, तो दुनिया में स्त्री और पुरुषों के संबंध अच्छे नहीं हो सकते। उनके अच्छे होने का एक ही रास्ता है कि हम यह समझें कि प्रेम दिया जाता है, प्रेम मांगा नहीं जाता, सिर्फ दिया जाता है। जो मिलता है, वह प्रसाद है, वह उसका मूल्य नहीं है। प्रेम दिया जाता है। नहीं मिलेगा, तो भी देने वाले को आनंद होगा कि उसने दिया।

अगर पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिकाएक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें, तो जीवन स्वर्ग बन सकता है। और जितना वे प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे, उतना ही-उन्हें प्रेम मिलेगा। और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे।

by-
"ओशो"

एक सूफी कथा---

एक बादशाह ने एक दिन सपने में अपनी मौत को आते हुए देखा। उसने सपने में अपने पास खड़ी एक छाया देख, उससे पूछा-'तुम कौन हो? यहां क्यों आयी हो?'

उस छाया या साये ने उत्तर दिया-मैं तुम्हारी मौत हूं और मैं कल सूर्यास्त होते ही तुम्हें लेने तुम्हारे पास आऊंगी।' बादशाह ने उससे पूछना भी चाहा कि क्या बचने का कोई उपाय है, लेकिन वह इतना अधिक डर गया था कि वह उससे कुछ भी न पूछ सका। तभी अचानक सपना टूट गया और वह छाया भी गायब हो गयी। आधी रात को ही उसने अपने सभी अक्लमंद लोगों को बुलाकर पूछा-'इस स्वप्न का क्या मतलब है, यह मुझे खोजकर बताओ।' और जैसा कि तुम जानते ही हो, तुम बुद्धिमान लोगों से अधिक बेवकूफ कोई और खोज ही नहीं सकते। वे सभी लोग भागे-भागे अपने-अपने घर गये और वहां से अपने-अपने शास्त्र साथ लेकर लौटे। वे बड़े-बड़े मोटे पोथे थे। उन लोगों ने उन्हें उलटना-पलटना शुरू कर दिया और फिर उन लोगों में चर्चा-परिचर्चा के दौरान बहस छिड़ गयी। वे अपने-अपने तर्क देते हुए आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगे।

उन लोगों की बातें सुनकर बादशाह की उलझन बढ़ती ही जा रही थी। वे किसी एक बात पर सहमत ही नहीं हो पा रहे थे। वे लोग विभिन्न पंथों के थे। जैसा कि बुद्धिमान लोग हमेशा होते हैं, वे स्वयं भी स्वयं के न थे।

वे उन सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखते थे, जिनकी परम्पराएं मृत हो चुकी थीं। उनमें एक हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा ईसाई था। वे अपने साथ अपने-अपने शास्त्र लाये थे और उन पोथों को उलटते-पलटते, वे बादशाह की समस्या का हल खोजने की कोशिशों पर कोशिशें कर रहे थे। आपस में तर्क-विर्तक करते-करते वे जैसे पागल हो गये। बादशाह बहुत अधिक व्याकुल हो उठा क्योंकि सूरज निकलने लगा था और जिस सूर्य का उदय होता है, वह अस्त भी होता है क्योंकि उगना ही वास्तव में अस्त होना है। अस्त होने की शुरुआत हो चुकी है। यात्रा शुरू हो चुकी थी और सूर्य डूबने में सिर्फ बारह घंटे बचे थे।

उसने उन लोगों को टोकने की कोशिश की, लेकिन उन लोगों ने कहा-'आप कृपया बाधा उत्पन्न न करें। यह एक बहुत गम्भीर मसला है और हम लोग हल निकालकर रहेंगे।'

तभी एक बूढ़ा आदमी-जिसने बादशाह की पूरी उम्र खिदमत की थी-उसके पास आया और उसके कानों में फुसफुसाते हुए कहा-'यह अधिक अच्छा होगा कि आप इस स्थान से कहीं दूर भाग जायें क्योंकि ये लोग कभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे नहीं और तर्क-वितर्क ही करते रहेंगे और मौत आ पहुंचेगी। मेरा आपको यही सुझाव है कि जब मौत ने आपको चेतावनी दी है, तो अच्छा यही है कि कम-से-कम आप इस स्थान से कहीं दूर सभी से पीछा छुड़ाकर चले जाइए। आप कहीं भी जाइयेगा, बहुत तेजी से।' यह सलाह बादशाह को अच्छी लगी-'यह बूढ़ा बिल्कुल ठीक कह रहा है। जब मनुष्य और कुछ नहीं कर सकता, वह भागने का, पीछा छुड़ाकर पलायन करने का प्रयास करता है।'

बादशाह के पास एक बहुत तेज दौड़ने वाला घोड़ा था। उसने घोड़ा मंगाकर बुद्धिमान लोगों से कहा-'मैं तो अब कहीं दूर जा रहा हूं और यदि जीवित लौटा, तो तुम लोग तय कर मुझे अपना निर्णय बतलाना, पर फिलहाल तो मैं अब जा रहा हूं।'

वह बहुत खुश-खुश जितनी तेजी से हो सकता था, घोड़े पर उड़ा चला जा रहा था क्योंकि आखिर यह जीवन और मौत का सवाल था। वह बार-बार पीछे लौट-लौटकर देखता था कि कहीं वह साया तो साथ नहीं आ रहा है, लेकिन वहां स्वप्न वाले साये का दूर-दूर तक पता न था। वह बहुत खुश था, मृत्यु पीछे नहीं आ रही थी और उससे पीछा छुड़ाकर दूर भागा जा रहा था।

अब धीमे-धीमे सूरज डूबने लगा। वह अपनी राजधानी से कई सौ मील दूर आ गया था। आखिर एक बरगद के पेड़ के नीचे उसने अपना घोड़ा रोका। घोड़े से उतरकर उसने उसे धन्यवाद देते हुए कहा-'वह तुम्हीं हो, जिसने मुझे बचा लिया।'

वह घोड़े का शुक्रिया अदा करते हुए यह कह ही रहा था कि तभी अचानक उसने उसी हाथ को महसूस किया, जिसका अनुभव उसने ख्वाब में किया था। उसने पीछे मुड़कर देखा, वही मौत का साया वहां मौजूद था।

मौत ने कहा-'मैं भी तेरे घोड़े का शुक्रिया अदा करती हूं, जो बहुत तेज दौड़ता है। मैं सारे दिन इसी बरगद के पेड़ के नीचे खड़ी तेरा इन्तजार कर रही थी और मैं चिन्तित थी कि तू यहां तक आ भी पायेगा या नहीं क्योंकि फासला बहुत लंबा था। लेकिन तेरा घोड़ा भी वास्तव में कोई चीज है। तू ठीक उसी वक्त पर यहां आ पहुंचा है, जब तेरी जरूरत थी।'

तुम कहां जा रहे हो? तुम कहां पहुंचोगे? सारी भागदौड़ और पलायन आखिर तुम्हें बरगद के पेड़ तक ही ले जायेगी। और जैसे ही तुम अपने घोड़े या कार को धन्यवाद दे रहे होगे, तुम अपने कंधे पर मौत के हाथों का अनुभव करोगे। मौत कहेगी-'मैं एक लम्बे समय से तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। अच्छा हुआ, तुम खुद आ गये।'

और प्रत्येक व्यक्ति ठीक समय पर ही आता है। वह एक क्षण भी नहीं खोता। प्रत्येक व्यक्ति ठीक वक्त पर ही पहुंचता है, कोई भी कभी देर लगाता ही नहीं। मैंने सुना है कि कुछ लोग वक्त से पहले ही पहुंच गये, लेकिन मैंने यह कभी नहीं सुना कि कोई देर से आया हो। कुछ लोग, जो समय से पहले पहुंचे थे, वह लोग अपने चिकित्सकों की मेहरबानी के कारण।
अपनी असफलता की वजह उसने यह ठहराई

कि वह काफी तेजी से नहीं दौड़ रहा था।

इसीलिए वह बिना रुके तेज और तेज दौड़ने लगा।

यहां तक कि अन्त में वह नीचे गिर पड़ा और मर गया।

वह यह समझने में असफल रहा

कि यदि उसने सिर्फ किसी पेड़ या किसी छांव की ओर कदम रखे होते,

तो उसकी छाया बनती ही नहीं

और यदि वह उसके नीचे बैठकर स्थिर हो ठहर गया होता,

तो न पैरों के कदम उठते और उनकी ध्वनि होती।

यह बहुत आसान था-सबसे अधिक आसान।

यदि तुम ठीक छाया की ओर बढ़ो, जहां धूप न हो, तो परछाई गायब हो जायेगी क्योंकि परछाई धूप या रोशनी के कारण ही बनती है। वह सूर्य की किरणों की अनुपस्थिति है। यदि तुम एक वृक्ष की छाया तले बैठ जाओ, तो परछाई लुप्त हो जायेगी।

वह यह समझने में असफल रहा

कि यदि उसने सिर्फ किसी पेड़ या किसी छांव की ओर कदम रखे होते,

तो उसकी परछाई बनती ही नहीं। वह गायब हो जाती।

इस छांव को कहते है--मौन। इस छांव को कहते हैं-आंतरिक शान्ति। मन की सुनो ही मत, बस केवल मौन की छांव में सरक जाओ, अपने अंदर गहरे में उतर जाओ, जहां सूर्य की कोई किरण प्रविष्ट नहीं हो सकती, जहां परम शान्ति है।

-ओशो

™ जो अपने आप को बर्बाद करने और अपने घर को उजाड़ने की हिम्मत रखते हैं वही असल मायने में मौजूदा व्यवस्था को बदल सकते हैं। ™

इलाहाबाद में सड़को पर आते-जाते वक़्त कोई न कोई अक्सर किसी कोचिंग वगैरा के ऐड वाला पर्चा पकड़ा देता है। अगर एक घंटे तक यूनिवर्सिटी के आसपास खड़े रहे तो आपको कम से कम 10-12 ऐसे पर्चे जरुर मिल जायेंगे । उन पर्चो से फायदा ये होता है की नए और सस्ते कोचिंग संस्थानों की जानकारी मिल जाती है। एक दूसरा सबसे बड़ा फायदा ये है की अगर आप 10 दिन तक उन पर्चो का संग्रह कर ले तो आपके पास इतना परचा इकठ्ठा हो जायेगा की आप उस पर्चे के दूसरी तरफ के बिना लिखे हुये भाग को बेहतर काम में ले सकते हैं। मसलन, आप चाहे तो उस पर कविता - कहानिया लिख सकते हैं या फिजिक्स, मैथ, कामर्स के न्यूमेरिकल साल्व कर सकते हैं या फिर चित्र वगैरा भी बना सकते हैं। आप तो करेंगे नहीं क्योकि आप तो रुपये पैसे वाले आदमी हैं। यहाँ "आप "का ताल्लुक कमजोर आर्थिक स्थिति वाले जुगाडू छात्रो से है।
उनके लिए अब इस प्रकार के जुगाड़ करना सम्भव नहीं दिख रहा है। कोचिंग वालो के दिमाग में न जाने क्या आ गया है की वो अब पर्चे के दोनों तरफ एड छापवाने लगे हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए , क्योकि इसी बहाने कम से कम कोई उनके पर्चो को लेता तो था। और सबसे बड़ी बात उसका सदुपयोग हो जाता था , उसे इज्जत मिल जाती थी। बाकि लोग तो उसे लेकर रोड पर फेक देते हैं। इससे पेपर भी वेस्ट होता है और सड़के भी गन्दी होती हैं। कोचिंग वालो को ऐसा नहीं करना चाहिए। ;-((

Sunday, May 19, 2013

जीवन के पथ पर ओ राही ...

ये क्या की इक ठोकर में ही रुक कर के घबराते हो,
बिना रण मे पाँव धरे ही पीछे को हट जाते हो,
अभी शौर्य गाथाए लिख कर तुम्हे इतिहास बदलना है,
जीवन के पथ पर ओ राही तुमको मीलो चलना है।
माना की तन क्षीण हुआ है, मन में दुविधा भर आई है
पर क्या बोलो धरा कभी रुक कर के यूँ सुस्ताई है,
कंधो पर ले भार तुम्हे अंतिम क्षण तक बस चलना है,
है,
जीवन के पथ पर ओ राही तुमको मीलो चलना है।
याद तुम्हे उन मधुर क्षणों की रह रह कर तड़पायेगी ,
तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य मार्ग से पीछे को लौटाएगी,
मगर कभी क्या रूख गंगा का गंगोत्री में बदला है,
गंगा सा अविरल तुमको नित बहते ही बह चलना है,
है,
जीवन के पथ पर ओ राही तुमको मीलो चलना है।

एक सन्देश ..मुर्दा लोगो के नाम ।

हम खुश है, हमारा पेट भरा हुआ है, जीवन मस्ती में बीत रहा है तो हमे लगता है की बस्स्स!!! दुनिया में सभी सुखी हैं , आनंद में हैं। जरा चकाचौंध से बाहर निकलिए, अपने दायरे को बढ़ाईये! आसपास के वातावरण को देखिये! आपको क्षद्म खुशहाली और विकास के पीछे भयंकर शोषण और अत्याचार नज़र आएगा। समाज में कही महिलाओ, बच्चो, बुढो का शोषण हो रहा है तो कही मुसलमानों, दलितों , आदिवासिओ का। घर से लेकर दफ्तर , गली से लेकर चौराहे, आचार से लेकर विचार ...सब दूषित नज़र आयेंगे!! आप इस गन्दगी में रह रहे हैं। आपको कोई परवाह नहीं है। क्या आप कीचड़ में लोटने वाले सुवर से किसी मायने में कम हैं?? क्या आप भी उसी की तरह गन्दगी में रह कर उसका आनंद उठाने लगे हैं?? सुबह उठते ही चाय काफी या सिगरेट पी कर या फिर मुह में तम्बाकू ठूस कर लैट्रिन में हगना, नास्ता कर के आफिस जाना, लंच करना, आफिस में पंचायत करना , आते जाते वक़्त रोड पर कमसिन लडकियो को घूरना, शाम को दारू या बियर पीना , रात में पत्नी के साथ सेक्स कर के सो जाना ...ये कोई जिंदगी है। क्या हमारी समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं हैं। क्या हम बस ऐसे ही कीड़े-मकोड़ो की तरह जी कर मर जाने के लिए बने हैं???
मुझे आश्चर्य है लोग युवा पीढ़ी से परिवर्तन की उम्मीद करते हैं। वो युवा पीढ़ी जो सिनेमा, क्रिकेट, नशा, सेक्स , अपराध आदि में दिन-ब-दिन लिप्त होती जा रही है। जो कुछ परिवर्तन करने के इक्षुक भी है उन्हें हमारी वर्तमान व्यवस्था ने रोजी-रोटी और पेट पालने के जुगाड़ तक सिमित कर रखा है। बचे-खुचे युवक पढ़-लिख कर इस शोषणकारी व्यवस्था का ही हिस्सा बन रहे है और भ्रष्टाचार तथा शोषण को बढ़ावा दे रहे है। हमारे यहाँ देश को आगे ले जाने के लिए केवल तालियाँ पीटने वाले हिजड़ो की फ़ौज तैयार हो रही है।
क्या हम इनके दम पर देश की दशा सुधारेंगे?? क्या हम इनकी बदौलत देश का विकास करेंगे। ?/ जवाब है ...नहीं!!! अब आपको आदत पड़ गयी है नाकारेपन की । अब आप केवल खामोशी से तमाशा देख सकते है।
और मै जानता हूँ की ये पढने के बाद आपकी ख़ामोशी टूटेगी। आपके हाथो में खुजली होने लगेगी , आपकी जुबान फड़फाड़ने लगेगी। शायद मैंने आपकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है। मै जानता हूँ आप आपने गिरेबान में झांके बिना मुझ पर उंगलियाँ उठाएंगे। लेकिन आप कितनो का मुह बंद करेंगे! मेरी जगह कल और भी बहुत से लोग आयेंगे। कितनो का मुह बंद करेंगे आप??? यकीन जानिए आपकी आने वाली पीढ़िया जिस दिन जागरूक होंगी आपको धिक्कारेंगी।आप कभी गर्व के साथ उनका सामना नहीं कर पाएंगे। थू है आप पर!!!

एक शायरी ...!!!

मंजूर नहीँ बंधन कोई,
उन्मुक्त गगन मेँ उड़ता हुँ.
वो नफरत की बातेँ करते,
मैँ छँद प्रेम के गढ़ता हूँ..

मानवता है पहचान मेरी,
मजहब से नहीँ मरासिम है,
वो नाम खुदा का लेते हैँ
मैँ काफिर बन के रहता हूँ...

ग़र राह कठिन आ जाए तो,
कठिनाई से क्या घबराना,
वो गैरोँ के पथ के राही
मैँ अपनी राह पे चलता हूँ...

आईना बन कर रहने पर,
पत्थर तो सहना होगा ही,
लेकिन मुझको परवाह नहीँ,
मैँ बात जो सच्ची कहता हूँ..