Wednesday, August 9, 2017

जर्मन ग्रेयर स्त्रियों की साज-सज़्ज़ा को हिकारत की नज़र से देखती थी और उसे पित्रसत्ता से प्रेरित मानती थी । अपनी पुस्तक The Female Eunch में वो लिखती हैं कि स्त्री गंधहीन और रोमविहीन होने के लिए जिस कदर   आसक्त रहती है , उसमें भारी विडंबना नज़र आती है । एक तरफ वो सिर पर केश का अंबार लिए रहती है तो दूसरी तरफ रोमविहीन भी बनी रहना चाहती है । एक तरफ वह अपनी मूल गंध छिपाने के लिए शरीर में कृत्रिम गंध का तालाब समाए फिरती है तो दूसरी तरफ एकांत में अपनी गंध भी ढूंढती है । शारीरिक सौष्ठव की बात करें तो वह अपने स्तनों को बांधे भी रखती है और उसकी आज़ादी भी चाहती है । वह कमर,  नितंब और योनि की बेहतरी भी चाहती है और आकार-प्रकार के फेर में बेहतरी को नज़रंदाज़ भी करती है । कुल मिलाकर इन सबमें घोर विडंबना व्याप्त नज़र आती है ।

मेकअप या कृत्रिम सौंदर्य इसी विडंबना से उपजा प्रतीत होता है । लेकिन यह उक्त स्थितियों से थोड़ा अलग है । आज के दौर की स्त्री पुरुषों के बनाये सौंदर्य प्रतिमानों की इतनी अभ्यस्त है कि वह कृत्रिमता को ही सत्य मानती है ।  कृत्रिम सौंदर्य उसकी जरूरत और आदत बन चुका है । बाजार ने भी इसे आम जीवन और संस्कृति का हिस्सा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । यह बाजार की गोद में फलफूल रहे कृत्रिम सौंदर्य का चरम ही है कि उसका विस्तार पुरुषप्रधान समाज के आम पुरुषों तक भी हो चुका है । इसके प्रकोप से मानव जाति के दोनों लिंग के हर आयुवर्ग के लोग पीड़ित होते जा रहे हैं ।

आप सोच रहे होंगे इसके भला क्या नुकसान है ? यह तो हमें आकर्षक और सुंदर ही बनता है ।
लेकिन ऐसा नहीं है । यह कथित रूप से सिर्फ कुछ लोगों को आकर्षक और सुंदर बना रहा है वो भी अपने बनाये मापदंडों पर । इन्ही मापदंडों के आधार पर बाकी लोगों को यह कुरूप भी घोषित कर रहा है । उन्हें हीन और कमतर दिखा रहा है । अपने इस रूप में यह न सिर्फ मानव जाति की मूल प्रकृति बल्कि उसकी सहजता और सौंदर्यबोध को भी  बुरी तरह से नष्ट कर रहा है ।
जर्मन ग्रेयर के शब्दों में कहा जाए तो इस भयावह समस्या का एक ही हल है .." साफ-सुथरी , पाली-पोसी गयी देह - चाहे वह स्त्री की हो या पुरुष की "

मूक/बधिर ओलंपिक में वीरेंद्र का तीसरी बार गोल्ड..

फेमस रेसलर सुशील कुमार ने अपने एक इंटरव्यू में वीरेंद्र सिंह यादव का जिक्र किया था । उन्होंने बताया था कि वीरेंद्र ऐसा पहलवान है जिसे हराना नामुमकिन है । वो वीरेंद्र से पांच बार भिड़े लेकिन उन्हें हरा नहीं पाये । सभी मैच ड्रॉ ही रहे। 

कौन है ये वीरेंद्र सिंह यादव ?

वीरेंद्र वो शख्श है जिनके कारण ही भारत के लिए डीफगेम्स ने दरवाज़े खोल दिए । उन्ही की वजह से भारत  पहली बार deaflympics यानी मूक/बधिर ओलंपिक में भाग ले सका और वहां भारतीय खिलाड़ी भेजने की परंपरा शुरू हुई । वीरेंद्र पर एक “गूंगा पहलवान” नाम से  छोटी फिल्म भी बनाई गई है।

वीरेंद्र उस समय चर्चा में आये जब वो 2002 में नेशनल चैम्पियनशिप में टॉप-3 में पहुंचे । लेकिन इंटरनेशनल चैम्पियनशिप के लिए उनका सिलेक्शन नहीं हुआ। वे दुखी हुए पर लगे रहे । उन्होंने हार नहीं मानी । बाद में उन्होंने  डीफलिंपिक्स 2005 (मेलबर्न) में भारत को गोल्ड दिलाया ।
बीच में उनका प्रदर्शन कुछ समय के लिए ठीक नहीं रहा । 2009 के ओलंपिक में उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा । पर 2013 (बुल्गारिया) ओलंपिक में वापसी करते हुए उन्होंने भारत को फिर से गोल्ड दिलाया ।

गोल्ड जीतने का यह सिलसिला अब भी जारी है । इस बार 2017 के ओलंपिक में 26 जुलाई को उन्होंने तीसरी बार भारत के लिए गोल्ड जीता ।

वीरेंद्र बताते हैं कि कुश्ती का जुनून उन्हें अपने पिता से  मिला । उनके पिता को कुश्ती बेहद पसंद थी । वो वीरेंद्र को बचपन से ही अखाड़े में भेजते थे ।
शुरुआत में अखाड़े में दूसरे पहलवान उनकी शारीरिक विकलांगता का मजाक उड़ाते थे । वीरेंद्र जब वर्जिश करते तो लोग ताना कसते- 'देख गूंगा भी पहलवान बनेगा।' लेकिन वे अखाड़े में कोच के होठों की फड़कन और पहलवानों को देखकर दांव-पेंच के पैंतरे सीखने लगे । उन्होंने लोगो की बातों की परवाह किये बिना मेहनत की और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई ।

मैं टीवी नहीं देखता इसलिए मुझे पता नहीं है कि टीवी पर वीरेंद्र के बारे में कुछ आया या नहीं । पर भारत उम्मीद के सहारे चलने वाला , उम्मीद पर टिका देश है तो मैं उम्मीद कर सकता हूँ कि यहां कभी न कभी वीरेंद्र जैसे खिलाड़ियों की भी सुध ली जाएगी । उनकी बिना शब्दो की कही बातें सुनी जाएंगी । लोगो तक पहुचाई जाएंगी । उनको मिलने वाली  सुविधाओ  और उपलब्ध संसाधनों पर दो पल के लिए नज़र डाली जाएगी । ताकि भारत में मूक / बधिर खिलाड़ियों को भी अन्य दिव्यांग खिलाड़ियों की तरह सुविधा मिलने लगे । अभी दिव्यांग होने के बावजूद भी उन्हें अन्य खिलाड़ियों की तरह सुविधा नहीं मिलती है ।

एक हूल की जरूरत..! विश्व आदिवासी दिवस !

हूल का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है । लेकिन ब्रिटिश भारत में हुई आदिवासी क्रांतियों के बाद संभवतः आज के दौर में आदिवासियों द्वारा ऐसी कोई क्रांति देखने को नहीं मिलती जिसमें वो अपने अधिकारों के लिए सत्ता से लोहा लेते दिखे । जबकि आज के दौर में उनकी अस्मिता और संस्कृति को खत्म करने की कोशिशें ब्रिटिश भारत की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ गयी हैं ।

दरअसल , दुनियाभर में जहां भी लोकतंत्र पर अर्थतंत्र हावी है वहां यही स्थिति देखने को मिलती है । बीती दो शताब्दियों में इस अर्थतंत्र नें नगर-महानगर के रूप में अपनी एक लुभावनी भौतिक संरचना विकसित कर ली है और इस क्रम में प्राकृतिक अवस्था को लगातार हीन दिखाया है । इस ने हमारी सोच इस तरह की बना दी है कि हमें विकास का मतलब धरती के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और वृद्धि नहीं बल्कि उनका अंधाधुंध दोहन कर प्रदूषित , अमानवीय तथा कृत्रिम नगरों -महानगरों  की स्थापना और प्रसार समझ आता है । लोकतंत्र भी अब बदलाव की बजाय इसे वैधता प्रदान करने वाला उपकरण बन चुका है । हम लगातार इस भौतिक संरचना में जीते हुए इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि आज प्राकृतिक अवस्था हमें पिछड़ी और अविकसित अवस्था लगती है । हमें औद्योगिक विस्तार के समक्ष नदियों , जंगलों , पहाड़ो , नमभूमियों , पशु-पक्षियों के मूल आवासों आदि की सुरक्षा विकास विरोधी बात लगती है ।

आदिवासी हज़ारों साल से उक्त प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा रहे हैं । उन्होंने सहजीवी की तरह निर्भरता के साथ उसका संरक्षण भी किया है । आज जब कथित विकास के नाम पर हम इसमें हस्तक्षेप की कोशिश करते हैं तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन आदिवासियों पर पड़ता है । यह हस्तक्षेप न केवल उनके आवास में हस्तक्षेप होता है बल्कि उनकी अस्मिता और संस्कृति में भी हस्तक्षेप होता है । इसका विरोध स्थानीयता और हमारी विकास संबंधी अवधारणा के चलते विशाल लोकतंत्र के सामने नहीं टिक पाता है । हमें इस विरोध से कोई जुड़ाव भी महसूस नहीं होता है । न ही विरोध करने वालों के पक्ष में कोई संवेदना महसूस होती है । आदिवासियों का मारा जाना इस देश में एक बेहद सामान्य घटना है । ठीक उसी तरह जैसे सड़क चौड़ी होने पर किनारे खड़े पेड़ो का काटा जाना ।

कम शब्दों में कहूँ तो करोड़ो साल पुरानी प्रकृति पर अब दो सौ सालों में विकसित हुई उदासीनता भारी नज़र आती है । मैं आदिम और पुरातन अस्मिता के वाहक आदिवासियों की जीवन पद्धति में इस उदासीनता के विरुद्ध हूल देखता हूँ । मेरी मान्यता है कि विध्वंश के कगार पर पहुंचने से पहले शायद हम अपने भीतर इस अस्मिता को जागृत कर सकें । हमारे अस्तित्व के लिए यह जरूरी भी है ।