Wednesday, August 9, 2017

जर्मन ग्रेयर स्त्रियों की साज-सज़्ज़ा को हिकारत की नज़र से देखती थी और उसे पित्रसत्ता से प्रेरित मानती थी । अपनी पुस्तक The Female Eunch में वो लिखती हैं कि स्त्री गंधहीन और रोमविहीन होने के लिए जिस कदर   आसक्त रहती है , उसमें भारी विडंबना नज़र आती है । एक तरफ वो सिर पर केश का अंबार लिए रहती है तो दूसरी तरफ रोमविहीन भी बनी रहना चाहती है । एक तरफ वह अपनी मूल गंध छिपाने के लिए शरीर में कृत्रिम गंध का तालाब समाए फिरती है तो दूसरी तरफ एकांत में अपनी गंध भी ढूंढती है । शारीरिक सौष्ठव की बात करें तो वह अपने स्तनों को बांधे भी रखती है और उसकी आज़ादी भी चाहती है । वह कमर,  नितंब और योनि की बेहतरी भी चाहती है और आकार-प्रकार के फेर में बेहतरी को नज़रंदाज़ भी करती है । कुल मिलाकर इन सबमें घोर विडंबना व्याप्त नज़र आती है ।

मेकअप या कृत्रिम सौंदर्य इसी विडंबना से उपजा प्रतीत होता है । लेकिन यह उक्त स्थितियों से थोड़ा अलग है । आज के दौर की स्त्री पुरुषों के बनाये सौंदर्य प्रतिमानों की इतनी अभ्यस्त है कि वह कृत्रिमता को ही सत्य मानती है ।  कृत्रिम सौंदर्य उसकी जरूरत और आदत बन चुका है । बाजार ने भी इसे आम जीवन और संस्कृति का हिस्सा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । यह बाजार की गोद में फलफूल रहे कृत्रिम सौंदर्य का चरम ही है कि उसका विस्तार पुरुषप्रधान समाज के आम पुरुषों तक भी हो चुका है । इसके प्रकोप से मानव जाति के दोनों लिंग के हर आयुवर्ग के लोग पीड़ित होते जा रहे हैं ।

आप सोच रहे होंगे इसके भला क्या नुकसान है ? यह तो हमें आकर्षक और सुंदर ही बनता है ।
लेकिन ऐसा नहीं है । यह कथित रूप से सिर्फ कुछ लोगों को आकर्षक और सुंदर बना रहा है वो भी अपने बनाये मापदंडों पर । इन्ही मापदंडों के आधार पर बाकी लोगों को यह कुरूप भी घोषित कर रहा है । उन्हें हीन और कमतर दिखा रहा है । अपने इस रूप में यह न सिर्फ मानव जाति की मूल प्रकृति बल्कि उसकी सहजता और सौंदर्यबोध को भी  बुरी तरह से नष्ट कर रहा है ।
जर्मन ग्रेयर के शब्दों में कहा जाए तो इस भयावह समस्या का एक ही हल है .." साफ-सुथरी , पाली-पोसी गयी देह - चाहे वह स्त्री की हो या पुरुष की "

मूक/बधिर ओलंपिक में वीरेंद्र का तीसरी बार गोल्ड..

फेमस रेसलर सुशील कुमार ने अपने एक इंटरव्यू में वीरेंद्र सिंह यादव का जिक्र किया था । उन्होंने बताया था कि वीरेंद्र ऐसा पहलवान है जिसे हराना नामुमकिन है । वो वीरेंद्र से पांच बार भिड़े लेकिन उन्हें हरा नहीं पाये । सभी मैच ड्रॉ ही रहे। 

कौन है ये वीरेंद्र सिंह यादव ?

वीरेंद्र वो शख्श है जिनके कारण ही भारत के लिए डीफगेम्स ने दरवाज़े खोल दिए । उन्ही की वजह से भारत  पहली बार deaflympics यानी मूक/बधिर ओलंपिक में भाग ले सका और वहां भारतीय खिलाड़ी भेजने की परंपरा शुरू हुई । वीरेंद्र पर एक “गूंगा पहलवान” नाम से  छोटी फिल्म भी बनाई गई है।

वीरेंद्र उस समय चर्चा में आये जब वो 2002 में नेशनल चैम्पियनशिप में टॉप-3 में पहुंचे । लेकिन इंटरनेशनल चैम्पियनशिप के लिए उनका सिलेक्शन नहीं हुआ। वे दुखी हुए पर लगे रहे । उन्होंने हार नहीं मानी । बाद में उन्होंने  डीफलिंपिक्स 2005 (मेलबर्न) में भारत को गोल्ड दिलाया ।
बीच में उनका प्रदर्शन कुछ समय के लिए ठीक नहीं रहा । 2009 के ओलंपिक में उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा । पर 2013 (बुल्गारिया) ओलंपिक में वापसी करते हुए उन्होंने भारत को फिर से गोल्ड दिलाया ।

गोल्ड जीतने का यह सिलसिला अब भी जारी है । इस बार 2017 के ओलंपिक में 26 जुलाई को उन्होंने तीसरी बार भारत के लिए गोल्ड जीता ।

वीरेंद्र बताते हैं कि कुश्ती का जुनून उन्हें अपने पिता से  मिला । उनके पिता को कुश्ती बेहद पसंद थी । वो वीरेंद्र को बचपन से ही अखाड़े में भेजते थे ।
शुरुआत में अखाड़े में दूसरे पहलवान उनकी शारीरिक विकलांगता का मजाक उड़ाते थे । वीरेंद्र जब वर्जिश करते तो लोग ताना कसते- 'देख गूंगा भी पहलवान बनेगा।' लेकिन वे अखाड़े में कोच के होठों की फड़कन और पहलवानों को देखकर दांव-पेंच के पैंतरे सीखने लगे । उन्होंने लोगो की बातों की परवाह किये बिना मेहनत की और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई ।

मैं टीवी नहीं देखता इसलिए मुझे पता नहीं है कि टीवी पर वीरेंद्र के बारे में कुछ आया या नहीं । पर भारत उम्मीद के सहारे चलने वाला , उम्मीद पर टिका देश है तो मैं उम्मीद कर सकता हूँ कि यहां कभी न कभी वीरेंद्र जैसे खिलाड़ियों की भी सुध ली जाएगी । उनकी बिना शब्दो की कही बातें सुनी जाएंगी । लोगो तक पहुचाई जाएंगी । उनको मिलने वाली  सुविधाओ  और उपलब्ध संसाधनों पर दो पल के लिए नज़र डाली जाएगी । ताकि भारत में मूक / बधिर खिलाड़ियों को भी अन्य दिव्यांग खिलाड़ियों की तरह सुविधा मिलने लगे । अभी दिव्यांग होने के बावजूद भी उन्हें अन्य खिलाड़ियों की तरह सुविधा नहीं मिलती है ।

एक हूल की जरूरत..! विश्व आदिवासी दिवस !

हूल का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है । लेकिन ब्रिटिश भारत में हुई आदिवासी क्रांतियों के बाद संभवतः आज के दौर में आदिवासियों द्वारा ऐसी कोई क्रांति देखने को नहीं मिलती जिसमें वो अपने अधिकारों के लिए सत्ता से लोहा लेते दिखे । जबकि आज के दौर में उनकी अस्मिता और संस्कृति को खत्म करने की कोशिशें ब्रिटिश भारत की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ गयी हैं ।

दरअसल , दुनियाभर में जहां भी लोकतंत्र पर अर्थतंत्र हावी है वहां यही स्थिति देखने को मिलती है । बीती दो शताब्दियों में इस अर्थतंत्र नें नगर-महानगर के रूप में अपनी एक लुभावनी भौतिक संरचना विकसित कर ली है और इस क्रम में प्राकृतिक अवस्था को लगातार हीन दिखाया है । इस ने हमारी सोच इस तरह की बना दी है कि हमें विकास का मतलब धरती के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और वृद्धि नहीं बल्कि उनका अंधाधुंध दोहन कर प्रदूषित , अमानवीय तथा कृत्रिम नगरों -महानगरों  की स्थापना और प्रसार समझ आता है । लोकतंत्र भी अब बदलाव की बजाय इसे वैधता प्रदान करने वाला उपकरण बन चुका है । हम लगातार इस भौतिक संरचना में जीते हुए इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि आज प्राकृतिक अवस्था हमें पिछड़ी और अविकसित अवस्था लगती है । हमें औद्योगिक विस्तार के समक्ष नदियों , जंगलों , पहाड़ो , नमभूमियों , पशु-पक्षियों के मूल आवासों आदि की सुरक्षा विकास विरोधी बात लगती है ।

आदिवासी हज़ारों साल से उक्त प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा रहे हैं । उन्होंने सहजीवी की तरह निर्भरता के साथ उसका संरक्षण भी किया है । आज जब कथित विकास के नाम पर हम इसमें हस्तक्षेप की कोशिश करते हैं तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन आदिवासियों पर पड़ता है । यह हस्तक्षेप न केवल उनके आवास में हस्तक्षेप होता है बल्कि उनकी अस्मिता और संस्कृति में भी हस्तक्षेप होता है । इसका विरोध स्थानीयता और हमारी विकास संबंधी अवधारणा के चलते विशाल लोकतंत्र के सामने नहीं टिक पाता है । हमें इस विरोध से कोई जुड़ाव भी महसूस नहीं होता है । न ही विरोध करने वालों के पक्ष में कोई संवेदना महसूस होती है । आदिवासियों का मारा जाना इस देश में एक बेहद सामान्य घटना है । ठीक उसी तरह जैसे सड़क चौड़ी होने पर किनारे खड़े पेड़ो का काटा जाना ।

कम शब्दों में कहूँ तो करोड़ो साल पुरानी प्रकृति पर अब दो सौ सालों में विकसित हुई उदासीनता भारी नज़र आती है । मैं आदिम और पुरातन अस्मिता के वाहक आदिवासियों की जीवन पद्धति में इस उदासीनता के विरुद्ध हूल देखता हूँ । मेरी मान्यता है कि विध्वंश के कगार पर पहुंचने से पहले शायद हम अपने भीतर इस अस्मिता को जागृत कर सकें । हमारे अस्तित्व के लिए यह जरूरी भी है ।

Wednesday, June 28, 2017

लड़कियां

लडकियां,
तब कुछ ज़्यादा ही फिलोसोफिकल हो जाती हैं,
जब छोड़ने को होती हैं।
मने लोक परलोक,
जन्म पुनर्जन्म,
हम फिर मिलेंगे,
जग हँसाई,
कोख का क़र्ज़...
और बाउ जी दुहाई ।
......मनीषा हो जाती हैं एकदम ।
बाह बाह......बाह बाह....बाह बाह !!
हे फलाने...
आय हैव स्पेंट माय लाइफ्'स बेस्ट टाइम विद यू,
....और जो नए फलाने हैं न,
उनको कभी सच्चा पियार नहीं कर पाऊँगी,
मेरी आत्मा तुम्हारे पास है, फलाने !!
फलाने खुस्स रहना ज़िंगदी में,
मेरे लिए खुस्स रहना, फलाने ।
हे बाबू वाले फलाने
हे जानू वाले फलाने
तुम बहोत अच्छे हो,
देखना तुम्हे मुझसे भी अच्छी मिलेगी
मैं खोजुंगी ना !!
फलाने,
लड़कियों की जिंदगी बहुत कठिन होती है,
दू-चार साल तुम्हारे साथ रहके इस कठिनाई को टाला
(पर नए फलाने का ऑफर इत्ता सही है कि सोचती हूँ कि लड़कियों वाली कठिन ज़िन्दगी को गले लगा ही लूं),
बाबू...फलाने
अब भूल जाने में ही बेहतरी है
ईश्वर भी यही चाहता है।।
वी शुड मूव ऑन !!
बाबू...मैं कभी भूल नहीं पाऊँगी तुम्हें
मैं अपनी कोख़ (भारी शब्द) से जब
किसी को जन्म दूंगी तो उसका नाम
तुम्हारे नाम पे रखूंगी...
'फलाने' ।
और नए घर में बाप का नाम
अपने नाम के साथ जोड़ने की होगी अगर प्रथा
तो नाम हो जायेगा
'पुराने फलाने' 'नए फलाने' सिंह यादो
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साली टोनही..
नागिन,
कहाँ से लाती है रे येे सब...
और फिर इस्त्री विमर्श भी बतियाती है !!

- Abhishek Kumar Yadav की कविता , फेसबुक से साभार

दुःख

अब दुखी होता हूँ तो रोता नहीं हूँ
काँखता हूँ , किचकिचता हूँ ,
जोर लगाता हूँ
लेकिन आंसू नहीं निकलते
खौझिया के चिकोटी काटता हूँ
भावुक करने वाला सिनेमा भी देखता हूँ
याद करता हूँ सबसे बुरा दौर
अ भावनाओ को ठेलता हूँ
कि आँख से निकर जाएँ
कुछ नहीं होता
बस लाल आँख बाहर लटक जाती है
अ कपार में गोजर रेंगता है
जाने का हो गया है मरदे
के जौन एक गंगा थी
अ एक जमुना
अब दूनो सरसती हैं
रीता है..
गिलई भी नहीं बची..

धड़कन बढ़ती है दुखी होने पर
धड़धड़ धड़धड़ चलती है
कपार सुक्क सायं करता है
पेट में घुमड़न होती है
अ गैस भी बनती है
पहिले बीड़ी जला के खेत में बैठ जाते थे
लखनी , कबड्डी , कितकित्ता
अ गुल्ली डंडा जमाते थे
दौर आते थे गांव के अंतिम छोर तक
मछरी मार लेते थे
एह ताल से ओह ताल तक जाते थे
भैइस चरा आते थे
अ झांझ तक
कपार से पेट तक सब
ढरक के खाली हो जाता था
पर अब पड़ा रहते हैं
चूल्हा पे खाली कुकर जईसा
जलता रहते हैं भीतर ही भीतर
न प्रेसर बनता है
न किछू हिलता डुलता है
फालतू क क्लीन एनर्जी भेस्टिंग
होता है
डबरे जईसे आँख थी कभी
लबालब भरी
अब रीता है मरदे
गिलई भी नहीं बची ....

कभो कभो धार याद आती है तो
सोचते हैं अब कब फूटेगी
बरसात के पहिले तो नहर भी आ जाती थी
इ तो आँख है
कबले तकायेगी
केतना थकायेगी
गुसिया के गरियाते भी हैं
हरे मेघदूत
चार इंच ऊपर खोपड़ी में सनेसा
नहीं भेज सकते भोसड़ी के
हम सुखै मर जाए
लौड़ू के पुते
फेर मन को डांट के चुप करा देते हैं
केतना गरियाएगा मूरख
इ भीतर क आवाज़ है
भित्तर ही रह जाएगा ,
कौनो नहीं सुनेगा
कौनो नहीं जानेगा
मरद होने का दुःख
मरद होने का नुकसान
मरद होना एतना आसान नहीं
मरद मार के बनता है मरद
मरद मरा के बनता है मरद
एही से मरद को दरद नहीं होता
साच कहें
अब हमार बचपन सूख के
मरुस्थल बन गया है
सब तरफ
खाली झाड़-झंखार काटा-कूटी है ..
अब मान भी  ले मरदे
के सब रीता है
गिलई भी नहीं बची...




पगली

हमरे गांव की पगली मर गयी आज
ऊ पहले हुशियार थी
गांव में सबसे गुणी
मरद उसका सिपाही था
अपने माई-बाऊ का अकेला
एक दिन डूटी पे नक्सली घेर के मार दिए
अ पगली बिधवा हो गयी
फेर नेता जी आये
रिस्तेदार आये
और पता नहीं कहाँ कहाँ के लोग आये
एक बोला बड़का अधिकारी मरवाएन
एक बोला नक्सलिया हरामी मरवाएन
एक बोला सरकार मरवाएन
एक बोला नीच जात क मनई हर जगह मराता है
ऊँचा जातिया का मलाई खाता है
एक बोला इ का पूंजीबाद मार डालेन
सामबाद रहता तो बच जाता..
पगली सब सुनती रही अ लगतार
सुनती रही
फेर चीख के बोली ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आई सबके मार गिराई "

फेर पगली पगला गयी.
तबसे पगली पगलै रही.
आँख खुलते ही
सबको गरियाती सबको दौराती ,
जब तक कि ओकरा आंख नहीं बन हो जाती ..
रोज बस एक्के काम एक्के पीड़ा एक्के क्षोभ ..
एक दिन सास ऊब के बोली
बेटवा खा गयी इ कुलटा !
अब हमको खायेगी
पगली जोर से चीखी ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आयी सबके मार गिराई "

पगली गांव भर दौरी
चीखी चिल्लाई गरियायी
सबकी बेदना मर गयी
सबकी शरम जी उठी.
का करे अब ?
रोज गाली रोज फ़ज़ीहत ..
एकरा माई-बाऊ क गोड़ कबर में
सास-ससुर केतना सहे ..
तब पाड़े बुद्धि बताये
छोड़ आओ जंगल में
उँहा सब बिला जाता है
कुक्कुर-बिलार , गोरु-भईस , मनई सब
केहू को पता नहीं चलेगा..
उसी रात पाड़े का टट्टर आया
अ सुबरे पगली जंगल में ...
सुना है पैडे भर चीखी
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आई , सबके मार गिराई "

आज महीना भर बाद खबर आई
पगली सिवान से बाहर निकर के गांव गांव भटकी
अ फेर एक दिन सिपाही ने रोक लिया
पूछा ,
केने जाना है ?
पगली बोली ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आई सबके मार गिराई "

सिपाही चार गोली मारा सर में .
अ पगली के मुंह पर थूका ,
" नक्सली माधारचोद "
फेर पगली मर गयी.
ओकरा मरद नहीं आया
किसी को मार के नहीं गिराया
सब जिन्दा है सब यहीं पडे हैं
बस पगली चली गयी
अपने मरद के पास
पर जो हुआ अच्छा हुआ
उसे अब केहू को बोलाना नहीं पड़ेगा
गरियाना नहीं पड़ेगा
ऊ साथ नहीं खोजेगी
ऊ इंतज़ार नहीं करेगी
ऊ भरोसा नहीं करेगी
अब भित्तर भित्तर भी नहीं मरेगी
नहीं कहेगी ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आयी ! सबके मार गिराई ! "

झुल्लन की मेहरारु

" झुल्लन की मेहरारु "
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टिकुली लगा के जब आईना निहारती है झुल्लन कि मेहरारू
तो दिल मुस्किया के हंस देता है...
झुल्लन की मेहरारू का जाने
ओकरे फेर में हम देवाल में केतना मुक्का कर दिए
कि झाँक सकें , निहार सके
बिल से अपना नज़र में अ नज़र से दिल में उतार सकें ..
ओकरी सूरत , ओकरी काया ..
हमार झुल्लन की मेहरारू !

हमार झुल्लन की मेहरारू का जाने
कि जब गोबर फेंकने जाती है
तो ओकरा हथेली पे हाथ पाथने को जी करता है
दउरी से गोबर नहीं गुलाब का खुसबू आता है
हम भित्तर ही भित्तर गमगमा जाते हैं
अ इ सोच-सोच के कसमसा उठते हैं कि घूर
के जगह दिल होता
अ गोबर की जगह प्रेम तो
अब तक पहाड़ बन गया होता
अ हम बीच से कहीं माझी क सड़क
निकार देते.
हमार झुल्लन की मेहरारू !

हमार झुल्लन की मेहरारू जब कपड़ा कचारती है
तो देख के दिमाग सुन्न हो जाता है
अ लौटती है जब चेतना तब एही सोच के
पछताते हैं कि खपड़ा से अच्छा
आठ - दस जोड़ी कपडा ही कीन लेते
तो झुल्लन की मेहरारू दिनभर फीचती
हम भीगते रात की बारिश में
भीतर अ बाहर से..
फीचे जाते इधर उधर से
अ सुबह ओकरा जइसन साफ़ अउर चिक्कन हो जाते..
हमार झुल्लन की मेहरारू !

जब निहारते हैं ओका दूध पिलाते हुए झुल्लन की बिटिया को
हमको याद आ जाती है हमार माई ..
केतना नेह से भरी थी
केतना प्यारी थी
माई को सोच के मुस्किया देते हैं अ
याद करते हैं
कि जब ओकरा पेट में मुंह सटा के पुर्र पुर्र पादने वाली आवाज़ निकालते  थे
तो कईसे ऊ हँस के हमको सीने से लगा लेती थी...
केतना नेह से भरी है
झुल्लन की मेहरारु
कि बिटिया जब काटती है तो सी सी कर के मुस्किया देती है
अ अपना छाती से चिपका के माथे पे
पुच्च पुच्च चार गो चुम्मा धर देती है
हम इ सोच के रह जातें है कि
हमको मिलता एतना नेह तो केतना खुश होती
हमार माई.
ऊपर से मुस्कियाती के हमरा बचवा अकेला नहीं है 
हमार झुल्लन की मेहरारु !

हमार झुल्लन की मेहरारू जब मार खाती है तो
ओकरा चीख हमरे कानो को बेध देती है .
हम रो पड़ते हैं फफक के ...
अ जब बाप चीखता है
के भोसडी के अब नींद में चिहूको तो फल्ट्ठा से पीटेंगे
त हम चुप हो जाते हैं
अ कोसते हैं अपने बाप को ..
झुल्लन को ..
दउवा को ...
केतना जुल्मी है रे तू
उठाना था तो झुल्लनवा को उठाता
हमरे बाप को उठाता
काहे छीन लिया हमरी माई को
झुल्लन की मेहरारु को
हमार झुल्लन की मेहरारु !

हमार झुल्लन की मेहरारु तू फिकिर ना करो
हम रोज दऊ से जुगाड़ भिडाते हैं
सोम्मार भोला क गोला ,
मंगर बजरंग बली क ब्रत
बुध गणेश क लड्डू
बेफे फेर भोला क चिलम
शुक्क मज़ार पे मुर्गा
शनिच्चर सौ ग्राम तेल चढ़ाते है
अ अतवार
अतवार भुख्खै बिताते हैं
कि कौन देवता होगा इस दिन का त खुस हो जाएगा
किरपा करेगा...
तू सबर करना हमार झुल्लन की मेहरारु
एह जनम न सही अगले जनम हम मिलेंगे
साथ में माई भी होगी

अ नहीं होगा कौनो बाप
कौनो झुल्लन ..

हमार झुल्लन की मेहरारु ..

बिस्मिल्लाह खां की याद में...

भारत रत्न बिसमिल्ला खां साहब को देख रहा था. जितना देख रहा था उतना ही उनकी शख्शियत में डूबा जा रहा था. कमाल के व्यक्ति थे. सुर में डूबे , सुर को समर्पित , सुर सुनने , सुर सुनाने और सुर बोलने वाले व्यक्ति.

सुर उनके लिए ईश्वर ,धर्म , इबादत सब कुछ था. उनका मानना था कि सुर की न कोई जाति होती है न मज़हब. सुर किसी की बपौती नहीं है. सुर उसी का है जो सुर का हो गया. यह दिलों को जोड़ता है , उन्हें आज़ाद करता है और बंधनों को ख़त्म कर देता है.

अपनी तमाम उपलब्धियों के बाद भी उन्हें किसी तरह का गुरुर नहीं था. एक बार एक पत्रकार ने पूछा , बिस्मिल्लाह साहब आपको भारत रत्न मिलने पर कैसा लगा. उन्होंने कहा अच्छा लगा पर कभी खुद को ख़ास महसूस नहीं होने दिया. कोई गुमान नहीं रखा. हमारे पड़ोस के लोग पूछते थे , ' का हो बिस्मिल्लाह तू त भारत रतन हो गईला. ' तो हम कहते थे , ' अबे भारत रतन हो गए तो हम बदल गए क्या. हम तो आज भी वही बिस्मिल्ला हैं. '
इतना कह कर वो जोर से हँस पड़ते थे.

लोग किसी बात को समझाने के लिए आमतौर पर दुनियावी बातों की मिसाल देते हैं , उन्ही को आधार मान कर समझने की कोशिश भी करते हैं. बिस्मिल्लाह साबह ऐसे नहीं थे. वो सुर से समझते थे और सुरों से ही लोगो को समझाते थे. अक्सर वो अपनी बात की मिसाल में कोई राग छेड़ देते थे. किसी की बात सुनकर कर कोई राग गुनगुनाने लगते थे और फिर थोड़ी देर बाद अपनी कहते थे. जैसे उनका जन्म ही शहनाई और सुरों की सेवा के लिए हुआ हो. वही उनकी भाषा , बोली , काव्य सबकुछ हो.

बिस्मिल्लाह साबह मिलनसार भी खूब थे. हर किसी से पूरी शिद्दत के साथ मिलते थे. सिवाय स्वार्थी और इस्तेमाल करने वाले लोगो के. और  सुर के मामले में तो  उनके लिए बड़े छोटे का भेद मतलब सुर का अपमान था. कोई भी सुरीला और मोहब्बत से भरा इंसान बड़ी आसानी से उनका दोस्त बन सकता था.

बहरहाल , उनको देखने बाद पहली बार मैं समझ सका कि अपने काम से प्यार करना क्या होता है. कैसे ये आपको बुलंदी पर पहुंचा सकता है.

अगर आपको अपने काम से सच्चा प्यार है तो वो आपकी सोच , आपकी  बातचीत , आपके व्यवहार ..हर जग दिखेगा.

उनसे सीखा कि अपने काम में महारत हासिल करने के बाद उसको अपनी बपौती नहीं समझना चाहिए. उसे कोई भी कर सकता है , ये सोचते हुए लोगो को अपने काम के साथ जोड़ना चाहिए. बिना किसी भेदभाव के.

ये जान सका सका कि आपके काम के बदले मिले सम्मान और पुरस्कार पर इतराना नहीं चाहिए. सर पर घमंड का ताज पहने खुद को विशिष्ट और लोगो से बिलकुल जुदा नहीं समझना चाहिए.

हमेशा अपनी माटी , अपनी ज़मीन , अपने लोगो से जुड़े रहना चाहिए.

अफ़सोस की आज बिस्मिल्लाह साहब हमारे बीच नहीं हैं.  वो आज होते तो उनसे जरूर मिलता. शायद , तब थोड़ा और ढंग का इंसान बन पाता.

आजकल मैं घासों को लेकर बेहद उत्साहित रहता हूं. मुझे कुछ समय पहले तक ये महत्वहीन लगती थी. पर आज मुझे इनकी महत्ता और मानव इतिहास में इनके योगदान के बारे में पता है. घास वो कारक है जिन्होंने इन्सान को पहली बार ग्लोबल बनाया. जिनकी वजह से इंसानों का विस्तार समूची धरती पर संभव हो सका. गौरतलब है कि आज हम जो भी अनाज खाद्यान्न के रूप में प्रयोग करते हैं वो घासों का ही विकसित और परिमार्जित रूप हैं.

जब हमारे पूर्वज बंदरो की संख्या तेजी से बढ़ने लगी और पेड़ो पर उनकी निर्भरता बहुत अधिक बढ़ गयी तभी धरती पर घास के बड़े बड़े मैदान अस्तित्व में आने शुरू हुए. क्योकि पेड़ रहने और खाने के लिए सीमित संख्या में थे इसलिए हमारे पूर्वज बंदरो को जमीन पर आना पड़ा । तब उन्हें सहारा दिया इन घास के मैदानों ने . उन्होंने इन घासों को भोजन के रूप में ग्रहण करना सीखा. इनके सहारे वो नई नई जगहों की खोज पर निकल पड़े. वो दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बसने लगे. नई खाद्य सामग्रियों की खोज करने लगे. उन्होंने घासों की वजह से ही मैदानों में रहना सीखा.

इस विस्तार ने उन्हें खत्म होने  से भी बचाया. क्योकि अगर वो एक ही क्षेत्र तक सीमित रहते तो इस बात की पूरी संभावना थी कि धरती के शुरुवाती खतरों की चपेट में आने से वो पूरी तरह लुप्त हो जाते. मगर घासों की वजह से ऐसा नही हुआ.

वो ध्रुवो की बर्फ के विस्तार की ओर गए जिसके कारण वो उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया तक पहुचे. वो बर्फ से बचने के लिए सुरक्षित स्थानों की तरफ भी गए जिसकी वजह से वो ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका भी पहुचें.

एक छोटी सी घास ने उनके लिए ऐसा माहौल तैयार किया जिसने उनके विस्तार को प्रेरणा दी. जिसकी वजह से उनका धरती के विभिन्न हिस्सों में बसना संभव हुआ. आज ग्लोबलाइजेशन को हम बिल्कुल अलग अर्थों में देखते हैं. पर मानव सभ्यता के शुरुवात में इसका स्वरूप अलग था.  पहला ग्लोबलाइजेशन धन , व्यापार या राजनीति के चलते नही हुआ. वो घासों के कारण हुआ. जो आज हमारे लिए महत्वहीन हैं.

निजीकरण से लाभ किसको

निजीकरण से लाभ किसको ?

भारतीय रेल , भारत सरकार की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी ( 165 साल )  कंपनी है. इसमें लगभग 14 लाख सरकारी कर्मचारी कार्यरत हैं. पूरे भारत में इसके 180 के आसपास प्रशिक्षण केन्द्र मौजूद हैं जिनमें हर साल रेलवे के लिए कर्मचारी तैयार किये जाते हैं.
भारतीय रेलवे के अंतर्गत प्रतिदिन 2.3 करोड़ लोग यात्रा  करते हैं जो ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी के बराबर है.
भारतीय रेल द्वारा साल भर में 8 अरब 39 करोड़ लोग यात्रा करते हैं जो विश्व की कुल आबादी से भी अधिक है.
जाहिर है भारतीय रेल सरकार का सबसे बड़ा उपक्रम है जो करोड़ो लोगो को परिवहन सुविधा प्रदान करता है और लाखों लोगो की आजीविका इस पर निर्भर है. कुल मिलाकर यह भारतीय परिवहन प्रणाली की रीढ़ है.

भाजपा सरकार आने के बाद रेलवे में निजीकरण की प्रक्रिया तेज हो गयी है. सरकार अब अपनी रीढ़ को गिरवी रखकर , रीढ़विहीन होने पर उतारू है. रेलवे के निजीकरण के संदर्भ में भाजपा की यह मान्यता रही है कि इसे ' प्रतियोगिता की एक ख़ुराक ’ देने की आवश्यकता है. यह खुराक रेलवे और इसकी सुविधाओ का उपयोग करने वाले करोड़ो यात्रियों को सूट करेगी या नहीं यह सरकार को नहीं पता है. किंतु निजीकरण की शुरुवात के बाद यह एहसास जरूर होने लगा है कि इस खुराक से जनता की सेहत बिगड़ रही है और सरकार तथा निजी कंपनिया सेहतमंद हो रही हैं. सरकार का मानना है कि उसने शुरू से ही रेलवे के निजीकरण को खारिज किया है. वो रेलवे में सिर्फ निजी भागीदारी बढ़ा रही है , उसका निजीकरण नहीं कर रही. अब सरकार चाहे कान सीधे पकड़े या उलट के पकड़े , बात तो एक ही होगी. तो परोक्ष रूप से कान पकड़कर उमेठने की प्रक्रिया जारी है.

खैर , मैं जो कहना चाह रहा था वो सरकारी उपक्रमो के निजीकरण के आर्थिक पहलू से थोड़ा अलग है.

यह सर्वविदित है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है. आरक्षण न होने की वजह से यहां दलितों , पिछड़ों , आदिवासियों , अल्पसंख्यको और महिलाओं की भागीदारी भी न के बराबर है. जहां भी सबकुछ निजी क्षेत्र के हवाले है वहाँ आरंभ से लेकर अब तक यही स्थिति बनी हुई है. सरकार का निजीकरण के पक्ष में उठाया गया हर कदम इन वर्गों के लिए घातक है. यह उन्हें और भी पीछे ले जाने वाला कदम है. आज़ादी के बाद से लेकर अब तक निजी क्षेत्र में उक्त वर्गों की निजी क्षेत्र में भागीदारी सुनिश्चित करने का कोई भी प्रयास , किसी भी सरकार द्वारा नहीं किया गया है. निजी क्षेत्र को छोड़ दिया जाय तो सरकारी क्षेत्र में जो प्रयास हुए हैं वो भी अब तक ढंग से लागू नहीं हो सकें हैं. ऐसे में सरकारी उपक्रमो का निजीकरण केवल वामपंथ की समस्या नहीं है. यह महज़  आर्थिक राजनीति का मसला भी नहीं है. भारत में यह पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद का संयुक्त प्रयास है. यह दोनों से जुड़ा हुआ मुद्दा है. इसीलिए निजीकरण से उपजी समस्याएं , दलित और स्त्री आंदोलनों की भी समस्याएं है.  यह अल्पसंख्यक राजनीति की भी समस्याएं है. यह उनके प्रतिनिधित्व पर सीधी डकैती है. उन्हें निजीकरण के ऐसे मसलों पर आंख मूंदकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए. उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि सरकार का जो फैसला सामान्य जनता के हित में नहीं है वो उस सामान्य जनता की 80% फीसदी वंचित वर्ग की आबादी के हित में भी नहीं है.

इसलिए सरकार की मंशा को समझिये..निजीकरण से किसको लाभ होगा जानिए..और कोशिश करिये की जातिगत मसलो से इतर निजीकरण के सवाल पर भी ध्यान दिया जाय.