आजकल मैं घासों को लेकर बेहद उत्साहित रहता हूं. मुझे कुछ समय पहले तक ये महत्वहीन लगती थी. पर आज मुझे इनकी महत्ता और मानव इतिहास में इनके योगदान के बारे में पता है. घास वो कारक है जिन्होंने इन्सान को पहली बार ग्लोबल बनाया. जिनकी वजह से इंसानों का विस्तार समूची धरती पर संभव हो सका. गौरतलब है कि आज हम जो भी अनाज खाद्यान्न के रूप में प्रयोग करते हैं वो घासों का ही विकसित और परिमार्जित रूप हैं.
जब हमारे पूर्वज बंदरो की संख्या तेजी से बढ़ने लगी और पेड़ो पर उनकी निर्भरता बहुत अधिक बढ़ गयी तभी धरती पर घास के बड़े बड़े मैदान अस्तित्व में आने शुरू हुए. क्योकि पेड़ रहने और खाने के लिए सीमित संख्या में थे इसलिए हमारे पूर्वज बंदरो को जमीन पर आना पड़ा । तब उन्हें सहारा दिया इन घास के मैदानों ने . उन्होंने इन घासों को भोजन के रूप में ग्रहण करना सीखा. इनके सहारे वो नई नई जगहों की खोज पर निकल पड़े. वो दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बसने लगे. नई खाद्य सामग्रियों की खोज करने लगे. उन्होंने घासों की वजह से ही मैदानों में रहना सीखा.
इस विस्तार ने उन्हें खत्म होने से भी बचाया. क्योकि अगर वो एक ही क्षेत्र तक सीमित रहते तो इस बात की पूरी संभावना थी कि धरती के शुरुवाती खतरों की चपेट में आने से वो पूरी तरह लुप्त हो जाते. मगर घासों की वजह से ऐसा नही हुआ.
वो ध्रुवो की बर्फ के विस्तार की ओर गए जिसके कारण वो उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया तक पहुचे. वो बर्फ से बचने के लिए सुरक्षित स्थानों की तरफ भी गए जिसकी वजह से वो ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका भी पहुचें.
एक छोटी सी घास ने उनके लिए ऐसा माहौल तैयार किया जिसने उनके विस्तार को प्रेरणा दी. जिसकी वजह से उनका धरती के विभिन्न हिस्सों में बसना संभव हुआ. आज ग्लोबलाइजेशन को हम बिल्कुल अलग अर्थों में देखते हैं. पर मानव सभ्यता के शुरुवात में इसका स्वरूप अलग था. पहला ग्लोबलाइजेशन धन , व्यापार या राजनीति के चलते नही हुआ. वो घासों के कारण हुआ. जो आज हमारे लिए महत्वहीन हैं.
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