अब दुखी होता हूँ तो रोता नहीं हूँ
काँखता हूँ , किचकिचता हूँ ,
जोर लगाता हूँ
लेकिन आंसू नहीं निकलते
खौझिया के चिकोटी काटता हूँ
भावुक करने वाला सिनेमा भी देखता हूँ
याद करता हूँ सबसे बुरा दौर
अ भावनाओ को ठेलता हूँ
कि आँख से निकर जाएँ
कुछ नहीं होता
बस लाल आँख बाहर लटक जाती है
अ कपार में गोजर रेंगता है
जाने का हो गया है मरदे
के जौन एक गंगा थी
अ एक जमुना
अब दूनो सरसती हैं
रीता है..
गिलई भी नहीं बची..
धड़कन बढ़ती है दुखी होने पर
धड़धड़ धड़धड़ चलती है
कपार सुक्क सायं करता है
पेट में घुमड़न होती है
अ गैस भी बनती है
पहिले बीड़ी जला के खेत में बैठ जाते थे
लखनी , कबड्डी , कितकित्ता
अ गुल्ली डंडा जमाते थे
दौर आते थे गांव के अंतिम छोर तक
मछरी मार लेते थे
एह ताल से ओह ताल तक जाते थे
भैइस चरा आते थे
अ झांझ तक
कपार से पेट तक सब
ढरक के खाली हो जाता था
पर अब पड़ा रहते हैं
चूल्हा पे खाली कुकर जईसा
जलता रहते हैं भीतर ही भीतर
न प्रेसर बनता है
न किछू हिलता डुलता है
फालतू क क्लीन एनर्जी भेस्टिंग
होता है
डबरे जईसे आँख थी कभी
लबालब भरी
अब रीता है मरदे
गिलई भी नहीं बची ....
कभो कभो धार याद आती है तो
सोचते हैं अब कब फूटेगी
बरसात के पहिले तो नहर भी आ जाती थी
इ तो आँख है
कबले तकायेगी
केतना थकायेगी
गुसिया के गरियाते भी हैं
हरे मेघदूत
चार इंच ऊपर खोपड़ी में सनेसा
नहीं भेज सकते भोसड़ी के
हम सुखै मर जाए
लौड़ू के पुते
फेर मन को डांट के चुप करा देते हैं
केतना गरियाएगा मूरख
इ भीतर क आवाज़ है
भित्तर ही रह जाएगा ,
कौनो नहीं सुनेगा
कौनो नहीं जानेगा
मरद होने का दुःख
मरद होने का नुकसान
मरद होना एतना आसान नहीं
मरद मार के बनता है मरद
मरद मरा के बनता है मरद
एही से मरद को दरद नहीं होता
साच कहें
अब हमार बचपन सूख के
मरुस्थल बन गया है
सब तरफ
खाली झाड़-झंखार काटा-कूटी है ..
अब मान भी ले मरदे
के सब रीता है
गिलई भी नहीं बची...
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