निजीकरण से लाभ किसको ?
भारतीय रेल , भारत सरकार की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी ( 165 साल ) कंपनी है. इसमें लगभग 14 लाख सरकारी कर्मचारी कार्यरत हैं. पूरे भारत में इसके 180 के आसपास प्रशिक्षण केन्द्र मौजूद हैं जिनमें हर साल रेलवे के लिए कर्मचारी तैयार किये जाते हैं.
भारतीय रेलवे के अंतर्गत प्रतिदिन 2.3 करोड़ लोग यात्रा करते हैं जो ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी के बराबर है.
भारतीय रेल द्वारा साल भर में 8 अरब 39 करोड़ लोग यात्रा करते हैं जो विश्व की कुल आबादी से भी अधिक है.
जाहिर है भारतीय रेल सरकार का सबसे बड़ा उपक्रम है जो करोड़ो लोगो को परिवहन सुविधा प्रदान करता है और लाखों लोगो की आजीविका इस पर निर्भर है. कुल मिलाकर यह भारतीय परिवहन प्रणाली की रीढ़ है.
भाजपा सरकार आने के बाद रेलवे में निजीकरण की प्रक्रिया तेज हो गयी है. सरकार अब अपनी रीढ़ को गिरवी रखकर , रीढ़विहीन होने पर उतारू है. रेलवे के निजीकरण के संदर्भ में भाजपा की यह मान्यता रही है कि इसे ' प्रतियोगिता की एक ख़ुराक ’ देने की आवश्यकता है. यह खुराक रेलवे और इसकी सुविधाओ का उपयोग करने वाले करोड़ो यात्रियों को सूट करेगी या नहीं यह सरकार को नहीं पता है. किंतु निजीकरण की शुरुवात के बाद यह एहसास जरूर होने लगा है कि इस खुराक से जनता की सेहत बिगड़ रही है और सरकार तथा निजी कंपनिया सेहतमंद हो रही हैं. सरकार का मानना है कि उसने शुरू से ही रेलवे के निजीकरण को खारिज किया है. वो रेलवे में सिर्फ निजी भागीदारी बढ़ा रही है , उसका निजीकरण नहीं कर रही. अब सरकार चाहे कान सीधे पकड़े या उलट के पकड़े , बात तो एक ही होगी. तो परोक्ष रूप से कान पकड़कर उमेठने की प्रक्रिया जारी है.
खैर , मैं जो कहना चाह रहा था वो सरकारी उपक्रमो के निजीकरण के आर्थिक पहलू से थोड़ा अलग है.
यह सर्वविदित है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है. आरक्षण न होने की वजह से यहां दलितों , पिछड़ों , आदिवासियों , अल्पसंख्यको और महिलाओं की भागीदारी भी न के बराबर है. जहां भी सबकुछ निजी क्षेत्र के हवाले है वहाँ आरंभ से लेकर अब तक यही स्थिति बनी हुई है. सरकार का निजीकरण के पक्ष में उठाया गया हर कदम इन वर्गों के लिए घातक है. यह उन्हें और भी पीछे ले जाने वाला कदम है. आज़ादी के बाद से लेकर अब तक निजी क्षेत्र में उक्त वर्गों की निजी क्षेत्र में भागीदारी सुनिश्चित करने का कोई भी प्रयास , किसी भी सरकार द्वारा नहीं किया गया है. निजी क्षेत्र को छोड़ दिया जाय तो सरकारी क्षेत्र में जो प्रयास हुए हैं वो भी अब तक ढंग से लागू नहीं हो सकें हैं. ऐसे में सरकारी उपक्रमो का निजीकरण केवल वामपंथ की समस्या नहीं है. यह महज़ आर्थिक राजनीति का मसला भी नहीं है. भारत में यह पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद का संयुक्त प्रयास है. यह दोनों से जुड़ा हुआ मुद्दा है. इसीलिए निजीकरण से उपजी समस्याएं , दलित और स्त्री आंदोलनों की भी समस्याएं है. यह अल्पसंख्यक राजनीति की भी समस्याएं है. यह उनके प्रतिनिधित्व पर सीधी डकैती है. उन्हें निजीकरण के ऐसे मसलों पर आंख मूंदकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए. उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि सरकार का जो फैसला सामान्य जनता के हित में नहीं है वो उस सामान्य जनता की 80% फीसदी वंचित वर्ग की आबादी के हित में भी नहीं है.
इसलिए सरकार की मंशा को समझिये..निजीकरण से किसको लाभ होगा जानिए..और कोशिश करिये की जातिगत मसलो से इतर निजीकरण के सवाल पर भी ध्यान दिया जाय.
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