हमरे गांव की पगली मर गयी आज
ऊ पहले हुशियार थी
गांव में सबसे गुणी
मरद उसका सिपाही था
अपने माई-बाऊ का अकेला
एक दिन डूटी पे नक्सली घेर के मार दिए
अ पगली बिधवा हो गयी
फेर नेता जी आये
रिस्तेदार आये
और पता नहीं कहाँ कहाँ के लोग आये
एक बोला बड़का अधिकारी मरवाएन
एक बोला नक्सलिया हरामी मरवाएन
एक बोला सरकार मरवाएन
एक बोला नीच जात क मनई हर जगह मराता है
ऊँचा जातिया का मलाई खाता है
एक बोला इ का पूंजीबाद मार डालेन
सामबाद रहता तो बच जाता..
पगली सब सुनती रही अ लगतार
सुनती रही
फेर चीख के बोली ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आई सबके मार गिराई "
फेर पगली पगला गयी.
तबसे पगली पगलै रही.
आँख खुलते ही
सबको गरियाती सबको दौराती ,
जब तक कि ओकरा आंख नहीं बन हो जाती ..
रोज बस एक्के काम एक्के पीड़ा एक्के क्षोभ ..
एक दिन सास ऊब के बोली
बेटवा खा गयी इ कुलटा !
अब हमको खायेगी
पगली जोर से चीखी ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आयी सबके मार गिराई "
पगली गांव भर दौरी
चीखी चिल्लाई गरियायी
सबकी बेदना मर गयी
सबकी शरम जी उठी.
का करे अब ?
रोज गाली रोज फ़ज़ीहत ..
एकरा माई-बाऊ क गोड़ कबर में
सास-ससुर केतना सहे ..
तब पाड़े बुद्धि बताये
छोड़ आओ जंगल में
उँहा सब बिला जाता है
कुक्कुर-बिलार , गोरु-भईस , मनई सब
केहू को पता नहीं चलेगा..
उसी रात पाड़े का टट्टर आया
अ सुबरे पगली जंगल में ...
सुना है पैडे भर चीखी
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आई , सबके मार गिराई "
आज महीना भर बाद खबर आई
पगली सिवान से बाहर निकर के गांव गांव भटकी
अ फेर एक दिन सिपाही ने रोक लिया
पूछा ,
केने जाना है ?
पगली बोली ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आई सबके मार गिराई "
सिपाही चार गोली मारा सर में .
अ पगली के मुंह पर थूका ,
" नक्सली माधारचोद "
फेर पगली मर गयी.
ओकरा मरद नहीं आया
किसी को मार के नहीं गिराया
सब जिन्दा है सब यहीं पडे हैं
बस पगली चली गयी
अपने मरद के पास
पर जो हुआ अच्छा हुआ
उसे अब केहू को बोलाना नहीं पड़ेगा
गरियाना नहीं पड़ेगा
ऊ साथ नहीं खोजेगी
ऊ इंतज़ार नहीं करेगी
ऊ भरोसा नहीं करेगी
अब भित्तर भित्तर भी नहीं मरेगी
नहीं कहेगी ,
" भै मधरचोद ! भै हरामी ! हमार मरद आयी ! सबके मार गिराई ! "
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