भारत रत्न बिसमिल्ला खां साहब को देख रहा था. जितना देख रहा था उतना ही उनकी शख्शियत में डूबा जा रहा था. कमाल के व्यक्ति थे. सुर में डूबे , सुर को समर्पित , सुर सुनने , सुर सुनाने और सुर बोलने वाले व्यक्ति.
सुर उनके लिए ईश्वर ,धर्म , इबादत सब कुछ था. उनका मानना था कि सुर की न कोई जाति होती है न मज़हब. सुर किसी की बपौती नहीं है. सुर उसी का है जो सुर का हो गया. यह दिलों को जोड़ता है , उन्हें आज़ाद करता है और बंधनों को ख़त्म कर देता है.
अपनी तमाम उपलब्धियों के बाद भी उन्हें किसी तरह का गुरुर नहीं था. एक बार एक पत्रकार ने पूछा , बिस्मिल्लाह साहब आपको भारत रत्न मिलने पर कैसा लगा. उन्होंने कहा अच्छा लगा पर कभी खुद को ख़ास महसूस नहीं होने दिया. कोई गुमान नहीं रखा. हमारे पड़ोस के लोग पूछते थे , ' का हो बिस्मिल्लाह तू त भारत रतन हो गईला. ' तो हम कहते थे , ' अबे भारत रतन हो गए तो हम बदल गए क्या. हम तो आज भी वही बिस्मिल्ला हैं. '
इतना कह कर वो जोर से हँस पड़ते थे.
लोग किसी बात को समझाने के लिए आमतौर पर दुनियावी बातों की मिसाल देते हैं , उन्ही को आधार मान कर समझने की कोशिश भी करते हैं. बिस्मिल्लाह साबह ऐसे नहीं थे. वो सुर से समझते थे और सुरों से ही लोगो को समझाते थे. अक्सर वो अपनी बात की मिसाल में कोई राग छेड़ देते थे. किसी की बात सुनकर कर कोई राग गुनगुनाने लगते थे और फिर थोड़ी देर बाद अपनी कहते थे. जैसे उनका जन्म ही शहनाई और सुरों की सेवा के लिए हुआ हो. वही उनकी भाषा , बोली , काव्य सबकुछ हो.
बिस्मिल्लाह साबह मिलनसार भी खूब थे. हर किसी से पूरी शिद्दत के साथ मिलते थे. सिवाय स्वार्थी और इस्तेमाल करने वाले लोगो के. और सुर के मामले में तो उनके लिए बड़े छोटे का भेद मतलब सुर का अपमान था. कोई भी सुरीला और मोहब्बत से भरा इंसान बड़ी आसानी से उनका दोस्त बन सकता था.
बहरहाल , उनको देखने बाद पहली बार मैं समझ सका कि अपने काम से प्यार करना क्या होता है. कैसे ये आपको बुलंदी पर पहुंचा सकता है.
अगर आपको अपने काम से सच्चा प्यार है तो वो आपकी सोच , आपकी बातचीत , आपके व्यवहार ..हर जग दिखेगा.
उनसे सीखा कि अपने काम में महारत हासिल करने के बाद उसको अपनी बपौती नहीं समझना चाहिए. उसे कोई भी कर सकता है , ये सोचते हुए लोगो को अपने काम के साथ जोड़ना चाहिए. बिना किसी भेदभाव के.
ये जान सका सका कि आपके काम के बदले मिले सम्मान और पुरस्कार पर इतराना नहीं चाहिए. सर पर घमंड का ताज पहने खुद को विशिष्ट और लोगो से बिलकुल जुदा नहीं समझना चाहिए.
हमेशा अपनी माटी , अपनी ज़मीन , अपने लोगो से जुड़े रहना चाहिए.
अफ़सोस की आज बिस्मिल्लाह साहब हमारे बीच नहीं हैं. वो आज होते तो उनसे जरूर मिलता. शायद , तब थोड़ा और ढंग का इंसान बन पाता.
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