Wednesday, June 28, 2017

सीपीआई ( एम ) के नेता ई.एम. एस. नंबूदरीपाद 1957 में केरल के मुख्यमंत्री बने. वो विश्व की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री थे. सत्ता में आने के बाद उन्होंने केरल को पूर्ण साक्षर बनाने का आंदोलन शुरू किया जिसका नतीजा आज हम देख रहे हैं.

1948 में उन्होंने अपनी पहली किताब 'केरला : मलयालीकालुडे मातृभूमि' लिखी. इसमें ईएमएस ने दिखाया कि "सामाजिक संबंधों पर ऊँची जातियाँ हावी हैं, उत्पादन संबंध 'जनमा' यानी ज़मींदारों के हाथों में हैं और प्रशासन की बागडोर 'नेदुवाझियों' यानी स्थानीय प्रभुओं के कब्ज़े में है. ईएमएस की निगाह में अधिकांश जनता की ग़रीबी और पिछड़ेपन का कारण यही समीकरण था."

सत्ता में आने के बाद ई.एम. एस. ने इस समीकरण को तोड़ने की शुरुवात की.
मुझे इसमें सबसे रुचिकर उनका जातीय प्रभुता को तोड़ने का कार्यक्रम लगा. उन्होंने सार्वजनिक भोज का आयोजन , दलितों के संघर्ष में उनका साथ देना , दलितों में सुधार की कोशिश आदि से इतर एक अन्य पहलू पर जोर दिया. उनकी यह कोशिश जातीय प्रभुता को समाप्त करने की दिशा में ईमानदारी भरा कदम मानी जा सकती  है. उन्होंने कहा कि "जातिगत शोषण ने केरल की नम्बूदिरी जैसी शीर्ष ब्राह्मण जाति का अमानवीकरण कर दिया है ". उन्होंने तथाकथित ऊंची जातियों में सुधार की बात कही और इस बात पर जोर दिया कि उनको दलित सुधार हेतु अपने लोगों के बीच ज्यादा काम करने की जरूरत है. वो अपने भाई बंधुओ और रिश्तेदारों के बीच सामाजिक समानता और बंधुत्व का प्रचार-प्रसार करें. इसके लिए उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर 'नम्बूदिरी को इनसान बनाओ’ का नारा देते हुए ब्राह्मण समुदाय के लोकतंत्रीकरण की मुहिम चलाई.

आज के दौर में जब दलित विमर्श मुख्यधारा की राजनीति में जगह बना रहा है , नंबूदरीपाद का आंदोलन कई मायनों में प्रासंगिक लगता है.
यह उन तथाकथित उच्च जाति  के  तथाकथित क्रांतिकारियों लिए प्रेरणा है जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थो के लिए दलित राजनीति में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं , उसकी पैरवी करते हैं लेकिन अपने ही परिवार और रिश्तेदारों की मानसिकता नहीं बदल पाते.
यह विडंबना ही कही जाएगी कि दलितों के सामने जाति का विरोध करने वाला , स्वयं को प्रगतिशील दिखाने वाला  , उनके आंदोलनों का नेतृत्व करने वाला तथाकथित ऊंची जाति का व्यक्ति अपनी जाति के लोगो में न सुधार की बात करता है न ही किसी तरह का आंदोलन खड़ा करता है.

अगर वास्तव में उन्हें दलितों के लिए कुछ करना है तो सबसे पहले सुधार की शुरुवात अपनी जाति और घर-परिवार के बीच करना होगा , उनमें सुधार की जिम्मेदारी लेनी होगी. अन्यथा उनकी दलित हितों की राजनीति और विमर्श हमेशा संदिग्ध बना रहेगा.

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