Saturday, October 5, 2013

क्रिस्तोफ़ किस्लोव्स्की -
हम बेहद ग़रीब परिवार से थे।
मेरे पिताजी सिविल इंजीनियर थे
और मेरी मां ऑफि़स में क्लर्क
थीं। मेरे पिताजी को टीबी थी और
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बारह
साल तक वह हर पल उससे जूझते हुए
मरते रहे। उन्हें बार-बार
सैनिटोरियम भेजा जाता था।
चूंकि हम, यानी मेरी मां,
मेरी बहन और मैं उनके क़रीब
रहना चाहते थे, हम उनके साथ-साथ
चले जाते। जिस शहर के सैनिटोरियम
में उन्हें भर्ती कराया जाता,
मेरी मां उसी शहर के किसी दफ्तर
में नौकरी कर लेतीं। जब उन्हें
दूसरे शहर के सैनिटोरियम में
भेजा जाता, हम भी उनके साथ दूसरे
शहर चले जाते। मां उस नए शहर में
अपने लिए नौकरी खोज लेती।
बचपन में मेरे फेफड़े भी बेहद
कमज़ोर थे। हमेशा यह
आशंका बनी रहती कि मुझे
भी टीबी हो जाएगी। दूसरे
बच्चों की तरह मैं भी फुटबॉल खेल
लेता या साइकिल चला लेता, लेकिन
ज़्यादातर समय मैं बीमार रहता,
इसलिए मुझे कंबल या चादर ओढ़ाकर
बरामदे में लिटा दिया जाता था।
बरामदे या आंगन में इसलिए
ताकि मेरे
फेफड़ों को ताज़ा हवा मिलती रहे।
ऐसे में मेरे पास काफ़ी समय
होता। मैंने उस समय का इस्तेमाल
पढऩे के लिए किया। जब मुझे ठीक
से पढऩा नहीं आता था,
मेरी मां मुझे किताबें पढ़कर
सुनाया करती थी। बहुत जल्द मैंने
पढऩे की शुरुआत कर दी। मैं बहुत
तेज़ पढ़ता था। मैं रात को छोटी-
सी टॉर्च
या मोमबत्ती की रोशनी में भी पढ़
लेता था। अक्सर चादर के भीतर
मुंह ढांपकर। सुबह तक उसी तरह
पढ़ता रहता।
जिस दुनिया में मैं रहता था,
उसमें दोस्त थे, साइकिलें थीं,
यहां-वहां भटक आना भी था। पर
मेरे लिए
किताबों की दुनिया भी उतनी ही असल
थी। ऐसा नहीं कि मेरे पास सिर्फ़
कामू और दोस्तोएव्स्की ही थे, ये
तो मेरी दुनिया का एक हिस्सा-भर
थे। उस दुनिया में काउबॉयज़
भी थे और देसी नायक भी। मैं
अच्छा साहित्य
भी उतनी ही रुचि से पढ़ता था,
जितना कि ख़राब साहित्य। आज
भी मैं यह साफ़-साफ़
नहीं बता सकता कि मैंने
दोस्तोएव्स्की से
ज़्यादा सीखा है या अमेरिका के
किसी थर्ड-रेट जासूसी कथा लेखक
से। मैं ऐसा कोई अंतर
जानना भी नहीं चाहता। लंबे समय
तक मैं यह
मानता रहा कि दुनिया में भौतिक
चीज़ों के अलावा कुछ चीज़ें
ऐसी भी होती हैं, जिन्हें आप छू
नहीं सकते या दुकानों में ख़रीद
नहीं सकते। किताबें
पढऩा ऐसा ही एक अनुभव है।
मेरे लिए मेरे
पिता ज़्यादा महत्वपूर्ण थे,
बजाय मां के, क्योंकि पिता बहुत
जल्दी चल बसे थे। लेकिन आज मैं यह
कह सकता हूं
कि मेरी मां भी उतनी ही महत्वपूर
थी, क्योंकि वही मुख्य कारण
थी कि मैं फिल्म स्कूल गया और
फिल्म लाइन में आया।
फिल्म स्कूल की प्रवेश
परीक्षा मैंने दूसरी बार दी थी।
उसके बाद ऐसी घटना घटी, जिसने
मेरी महत्वाकांक्षाओं को आग
की तरह भड़का दिया। परीक्षा के
बाद मैं घर आया। मां को फ़ोन
किया और तय किया कि हम वारसा में
चौराहे की सीढिय़ों के पास
मिलेंगे। मां को बहुत उम्मीदें
थीं कि मैं फिल्म स्कूल में
दाखि़ला ले लूंगा। मेरा करियर बन
जाएगा। हमारी समस्याएं दूर
हो जाएंगी। पर मुझे पता था कि मैं
दूसरी बार भी फेल हो चुका हूं।
वह सीढिय़ों पर ऊपर की तरफ़ से
पहुंची और मैं नीचे की तरफ़ से।
मैं चलते-चलते उसके पास पहुंचा।
मूसलाधार बरसात हो रही थी।
वहीं खड़े-खड़े मां पूरी तरह भीग
गईं। फिल्म स्कूल की प्रवेश
परीक्षा में मैं दूसरी बार
भी फेल हो गया था, यह जानकर वह
बेहद दुखी और निराश थीं।
उन्होंने बेहद अफ़सोस के साथ
कहा, 'शायद तुम फिल्मों के लिए
बने ही नहीं हो।'
मुझे नहीं पता, वह
रो रही थीं या बारिश के कारण
उनका चेहरा व आंखें गीली थीं,
लेकिन उन्हें इतना दुखी देखकर
मैं उनसे
भी ज़्यादा दुखी हो गया।
वही क्षण था, जब मैंने यह तय किया,
चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए,
अब मैं फिल्म स्कूल में
दाखि़ला लेकर ही रहूंगा। अब मैं
पूरी दुनिया के सामने यह साबित
करके रहूंगा कि मैं सिर्फ़ और
सिर्फ़ फि़ल्मों के लिए
ही बना हूं। सिर्फ़ इसलिए
कि बहुत दुखी होकर मेरी मां ने
वह बात कही थी। ठीक उसी क्षण
मैंने वह फ़ैसला किया था।
बरसों बाद एक महोत्सव में
पत्रकार सारे निर्देशकों से
सवाल कर रहे थे कि अगर वे फिल्म न
बनाते, तो क्या करते? सबने ख़ूब
जवाब दिए। मेरी बारी आई, तो मुझे
वारसा के उस चौराहे पर
खड़ी मां का दुखी चेहरा याद आ
गया। मैंने जवाब दिया,
'क्योंकि मुझे कोई दूसरा काम
नहीं आता। क्योंकि मैं
फिल्मों के लिए ही बना हूं।'
वहां उपस्थित फिल्मकारों में यह
सबसे छोटा जवाब था, इसीलिए यह उस
समय की सुर्खी़ बन गया।
पर सच तो यह है कि मैं आज तक
नहीं जानता, उस रोज़
मां रो रही थी या बारिश
हो रही थी।

Thursday, June 13, 2013

जिसे तुम अपनी मोहब्बत में बर्बाद कहते हो,
उसी के दिल में तुम आज भी आबाद रहते हो..!
भले ही इल्म न हो अब तुम्हे मेरी मोहब्बत का ,
नफ़स (सांस) में आज भी तुम खुशबू बन के महकते हो..!

मेरी चाहत की सतायिश (प्रसंशा) तुम करते थे रात-दिन,
मुखालिफ (विरोधी) बन के अब क्यों इतना मुझसे दूर रहते हो.!
इतनी रुसवाईयाँ अब बाखुदा अच्छी नहीं लगती,
किसी के इश्क में लगता है अब मगरूर रहते हो।

तुम्हारे जाने के बाद जिंदगी ज़ुल्मत (अँधेरा) में ठहरी है,
तुम हो के अब गैरो के घर का नूर (प्रकाश) रहते हो..!
कभी मौका मिले तो देखना इस दिल की महफ़िल को,
जहाँ की हर दर-ओ-दिवार में बस तुम ही रहते हो..!

मेरी उम्मीद मेरा हौसला बाकि न अब रहा,
बताओ किस तरह मर कर भी तुम जिन्दा से रहते हो..!
दो-चार बातों-मुलाकातोंका शायद सिलसिला ही था,
"विजय" पागल हो जिसको आज भी तुम इश्क कहते हो.

Friday, May 24, 2013

मशहूर ब्राजीलियन लेखक पाउलो कोएलो के संस्मरण से....

कोएलो लिखते हैं कि मैं रेलवे स्टेशन पर खड़ा अपने एक पब्लिशर के आने का इंतजार कर रहा था। मेरी नजर रेल की पटरियों पर पड़ी, जहां कुछ लोग उसकी मरम्मत कर रहे थे। अचानक एक सवाल दिमाग में दौड़ा। मैंने पास खड़े मजदूरों से पूछा, 'इन पटरियों के बीच दूरी कितनी होगी?' जवाब मिला 143.5 से.मी.।
पाउलो को यह दूरी कुछ अजीब सी लगी। न 150 से.मी., न 145 और न ही 144, आखिर 143.5 ही क्यों? उन्होंने मजदूर से फिर पूछा। इस पर उसने कहा, दरअसल ट्रेन के पहियों के बीच की दूरी इतनी ही होती है। लेकिन पाउलो ने तो इसे दूसरे ढंग से सोचा था। वह बोले, 'तुम्हें नहीं लगता इस दूरी की वजह से ट्रेन के पहियों के बीच की दूरी इतनी है।' स्टेशन वर्कर मुस्कुराया और बोला, 'चीजें ऐसी इसीलिए हैं, क्योंकि वे ऐसी ही हैं।'

यह जवाब पाउलो के दिमाग को शांत नहीं कर पाया। एक टाइम पास सवाल उनकी जिज्ञासा बन चुका था। उन्होंने कई किताबें देखीं, हजारों पन्ने पलटे। हालांकि इस कठिन खोजबीन से उन्होंने कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखी थी। पर आखिरकार जवाब कुछ ऐसा मिला - जब पहली टेन बनी तो उन्हीं टूल्स से बनी, जिनसे उस जमाने में दूसरी गाड़ियां-बग्गियां आदि बनती थीं और उन गाड़ियों के पहियों के बीच की दूरी 143.5 सेमी होती थी।

वह दूरी इतनी इसलिए रखी गई थी, क्योंकि पुरानी सड़कें इसी पैमाने के हिसाब से बनती थीं और यह मेजरमंट दिया था रोड बनाने वाले रोमनों ने। इस माप की वजह थी- लड़ाई में इस्तेमाल होने वाली घोड़ागाड़ी। दरअसल, अगल-बगल दौड़ने वाले घोड़े एक दूसरे के बीच इतनी ही दूरी लेते थे। संभव है कि इस दूरी को बहुत पहले कभी किसी रोमन एक्सपर्ट ने नापा हो और उसकी किस्मत से यह एक एक्सपर्ट माप बन गई, जिसका आज सारी दुनिया पालन करती है।

इस दूरी ने शायद कोई बहुत बड़ा अड़ंगा भी न डाला हो, इसलिए हर कोई इसे अपनाता गया। किसी ने इसे बदलने की कोशिश के बारे में सोचा भी होगा तो शायद इस पंक्ति ने उसे हरा दिया होगा - यह दूरी इतनी ही होती है और यही सही है।

पाउलो की इस रोचक कहानी का एक संदेश है - इसी तरह हमारी जिंदगी के रास्ते भी तय होते हैं। जीवन में कई चीजें बदलाव चाहती हैं, लेकिन यह सोच कि यही चला आ रहा है, हमें एक ही ढर्रे की जिंदगी जीने पर मजबूर करती है। बदलाव के लिए चाहिए हिम्मत - सोचने की और उस सोच पर अमल करने की।

तमाम वैज्ञानिकों, कलाकारों, लेखकों की हिम्मत का ही नतीजा है कि हम रोज एक बेहतर दुनिया में जी रहे होते हैं। लेकिन दुनिया में एक बड़ा हिस्सा वह है, जो यह हिम्मत नहीं कर पाता है। दसवीं के बाद हमारे पास मैथ्स छोड़ने का ऑप्शन होता है, लेकिन हम नहीं छोड़ते क्योंकि हमारे परिचित सीनियर्स ने ऐसा नहीं किया और न हमारे दोस्त ऐसा कर रहे हैं। हमें डर होता है कि ऐसा करने पर समाज की नजरों में हम कमजोर साबित हो जाएंगे। और इस वजह से हम उसे झेलते हैं - 2, 5, 7 साल या जिंदगी भर। क्या जरूरी है कि हम डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, साइंस, कॉमर्स या इकनॉमिक्स ही पढ़ें, क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि ऐसा सारी दुनिया सोचती है?

Wednesday, May 22, 2013

रेत की कहानी ..एक सूफी कथा।


      एक उछलता हुआ झरना रेगिस्‍तान पहुंचा। उसे दिखाई दिया कि वह उसे पार नहीं कर सकेगा। बारीक रेत में उसका पानी तेजी से सूख रहा था। झरने ने स्‍वयं से कहा, ‘’रेगिस्‍तान को पार करना मेरी नियति है लेकिन उसके आसार नजर नहीं आते है।
      यह शिष्‍य की स्‍थिति है जिसे सदगुरू की जरूरत होती है। लेकिन वह किसी पर श्रद्धा नहीं कर सकता। यह मनुष्‍य की दुखद हालत है।
      रेगिस्‍तान की आवाज ने कहा, ‘’हवा रेगिस्‍तान को पार करती है, तुम भी कर सकते हो।‘’
      झरना बोला, ‘’जब भी मैं कोशिश करता हूं मेरा पानी रेत में समा जाता है, और मैं कितना ही जोर लगाऊं थोड़ी दूर ही जा पाता हूं।
      हवा रेगिस्‍तान के साथ जोर नहीं लगाती।
   लेकिन हवा उड़ सकती है, मैं उड़ नहीं सकती।
      तुम गलत ढंग से सोच रही हो। अकेले उड़ने की कोशिश मूढ़ता है। हवा को तुम्‍हें ले जाने दो।
      झरने ने कहा कि वह अपनी निजता को खोना नहीं चाहता। इस तरह तो उसकी हस्‍ती खो जाएगी। रेत ने समझाया कि इस तरह सोचना तर्क का एक भाग है लेकिन यथार्थ के साथ उसका कोई ताल्‍लुक नहीं है। हवा जल की नमी को आत्‍म सात कर लेती है। रेगिस्‍तान के पार ले जाती है। और फिर बरसात बन कर पुन: नीचे ले आती है।
      झरना पूछता है, ‘’यदि ऐसा है तो क्‍या मैं यही झरना रहूंगा जो आज हूं।‘’
      रेत बोली; ‘’यों भी किसी सूरत में तुम यही नहीं रहोगे। तुम्‍हारे पास कोई चुनाव नहीं है। हवा तुम्‍हारे सार तत्‍व को, सूक्ष्‍म अंश को ले जाएगी। जब रेगिस्‍तान के पार, पहाड़ों में तुम फिर नदी बन जाओगे। फिर लोग तुम्‍हें किसी और नाम से पुकारेगा। लेकिन भीतर गहरे में तुम जानोंगे: ‘’मैं वहीं हूं।‘’
      हवा की स्‍वागत करती हुई बांहों में स्मारक झरना रेगिस्‍तान के पार चला गया। हवा उसे पर्वत की चोटी पर ले गई और फिर धीरे से, लेकिन दृढ़ता से जमीन पर गिरा दिया। झरना बुदबुदाया: ‘’अब मुझे मेरी वास्‍तविक अस्‍मिता का पता चला। फिर भी एक प्रश्न उसके मन में था। ‘’मैं अपने आप को क्‍यों नहीं जान सका।‘’ रेत को मुझे क्‍यों बताना पडा।
      एक छोटी सी आवाज उसके कानों में गूँजी। रेत का एक कण बोल रहा था: सिर्फ रेत ही जान सकती है क्‍योंकि उसने कई बार इसे घटते देखा है। क्‍योंकि वह नदी से लेकिर पर्वत तक फैली हुई है। जीवन की सरिता अपनी यात्रा कैसे करेगी इसका पूरा नक्‍श रेत में बना होता है।‘’

Tuesday, May 21, 2013

प्रेम..

जीवन को प्रेम से भरें ।आप कहेंगे, हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं, आप शायद ही प्रेम करते हों; आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। प्रेम करना और प्रेम चाहना, ये बड़ी अलग बातें हैं। हममें से अधिक लोग बच्चे ही रहकर मर जाते हैं। क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है। प्रेम करना बड़ी अदभुत बात है। प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है। छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं, परिवार उनको प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए, तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं, तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है, वह दुख झेलता है। क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता, प्रेम केवल किया जाता है। चाहने में पक्का नहीं है, मिलेगा या नहीं मिलेगा। और जिससे तुम चाह रहे हो, वह भी तुमसे चाहेगा। तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे। दुनिया में जितना पति-पत्नियों प्रेमी-प्रेमिका­ओ का संघर्ष है,

उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है।

इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आपकी आकांक्षा प्रेम चाहने की है हमेशा। चाहते हैं, कोई प्रेम करे। और जब कोई प्रेम करता है, तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है, वह दूसरा भी प्रेम करना केवल वैसे ही है जैसे कि कोई मछलियों को मारने वाला आटा फेंकता है। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है। वह आटा मछलियों को दे नहीं रहा है, वह मछलियों को चाहता है, इसलिए आटा फेंक रहा है।

इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखायी पड़ते हैं, वे केवल प्रेम पाना चाहने के लिए आटा फेंक रहे हैं। थोड़ी देर वे आटा खिलाएंगे, फिर...। और दूसरा व्यक्ति भी जो उनमें उत्सुक होगा, वह इसलिए उत्सुक होगा कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा। थोड़ी देर बाद पता चलेगा, वे दोनों भिखमंगे हैं और भूल में थे; एक-दूसरे को बादशाह समझ रहे थे! और थोड़ी देर बाद उनको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी। दुनिया में दाम्पत्य जीवनऔर उसके पूर्व का प्रेम सम्बन्ध नर्क बना हुआ है, क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं, देना कोई भी जानता नहीं है।

झगड़े का बुनियादी कारण -

सारे झगड़े के पीछे बुनियादी कारण इतना ही है। और कितना ही परिवर्तन हो, किसी तरह के विवाह हों, किसी तरह की समाज व्यवस्था बने, जब तक जो मैं कह रहा हूं अगर नहीं होगा, तो दुनिया में स्त्री और पुरुषों के संबंध अच्छे नहीं हो सकते। उनके अच्छे होने का एक ही रास्ता है कि हम यह समझें कि प्रेम दिया जाता है, प्रेम मांगा नहीं जाता, सिर्फ दिया जाता है। जो मिलता है, वह प्रसाद है, वह उसका मूल्य नहीं है। प्रेम दिया जाता है। नहीं मिलेगा, तो भी देने वाले को आनंद होगा कि उसने दिया।

अगर पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिकाएक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें, तो जीवन स्वर्ग बन सकता है। और जितना वे प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे, उतना ही-उन्हें प्रेम मिलेगा। और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे।

by-
"ओशो"

एक सूफी कथा---

एक बादशाह ने एक दिन सपने में अपनी मौत को आते हुए देखा। उसने सपने में अपने पास खड़ी एक छाया देख, उससे पूछा-'तुम कौन हो? यहां क्यों आयी हो?'

उस छाया या साये ने उत्तर दिया-मैं तुम्हारी मौत हूं और मैं कल सूर्यास्त होते ही तुम्हें लेने तुम्हारे पास आऊंगी।' बादशाह ने उससे पूछना भी चाहा कि क्या बचने का कोई उपाय है, लेकिन वह इतना अधिक डर गया था कि वह उससे कुछ भी न पूछ सका। तभी अचानक सपना टूट गया और वह छाया भी गायब हो गयी। आधी रात को ही उसने अपने सभी अक्लमंद लोगों को बुलाकर पूछा-'इस स्वप्न का क्या मतलब है, यह मुझे खोजकर बताओ।' और जैसा कि तुम जानते ही हो, तुम बुद्धिमान लोगों से अधिक बेवकूफ कोई और खोज ही नहीं सकते। वे सभी लोग भागे-भागे अपने-अपने घर गये और वहां से अपने-अपने शास्त्र साथ लेकर लौटे। वे बड़े-बड़े मोटे पोथे थे। उन लोगों ने उन्हें उलटना-पलटना शुरू कर दिया और फिर उन लोगों में चर्चा-परिचर्चा के दौरान बहस छिड़ गयी। वे अपने-अपने तर्क देते हुए आपस में ही लड़ने-झगड़ने लगे।

उन लोगों की बातें सुनकर बादशाह की उलझन बढ़ती ही जा रही थी। वे किसी एक बात पर सहमत ही नहीं हो पा रहे थे। वे लोग विभिन्न पंथों के थे। जैसा कि बुद्धिमान लोग हमेशा होते हैं, वे स्वयं भी स्वयं के न थे।

वे उन सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखते थे, जिनकी परम्पराएं मृत हो चुकी थीं। उनमें एक हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा ईसाई था। वे अपने साथ अपने-अपने शास्त्र लाये थे और उन पोथों को उलटते-पलटते, वे बादशाह की समस्या का हल खोजने की कोशिशों पर कोशिशें कर रहे थे। आपस में तर्क-विर्तक करते-करते वे जैसे पागल हो गये। बादशाह बहुत अधिक व्याकुल हो उठा क्योंकि सूरज निकलने लगा था और जिस सूर्य का उदय होता है, वह अस्त भी होता है क्योंकि उगना ही वास्तव में अस्त होना है। अस्त होने की शुरुआत हो चुकी है। यात्रा शुरू हो चुकी थी और सूर्य डूबने में सिर्फ बारह घंटे बचे थे।

उसने उन लोगों को टोकने की कोशिश की, लेकिन उन लोगों ने कहा-'आप कृपया बाधा उत्पन्न न करें। यह एक बहुत गम्भीर मसला है और हम लोग हल निकालकर रहेंगे।'

तभी एक बूढ़ा आदमी-जिसने बादशाह की पूरी उम्र खिदमत की थी-उसके पास आया और उसके कानों में फुसफुसाते हुए कहा-'यह अधिक अच्छा होगा कि आप इस स्थान से कहीं दूर भाग जायें क्योंकि ये लोग कभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे नहीं और तर्क-वितर्क ही करते रहेंगे और मौत आ पहुंचेगी। मेरा आपको यही सुझाव है कि जब मौत ने आपको चेतावनी दी है, तो अच्छा यही है कि कम-से-कम आप इस स्थान से कहीं दूर सभी से पीछा छुड़ाकर चले जाइए। आप कहीं भी जाइयेगा, बहुत तेजी से।' यह सलाह बादशाह को अच्छी लगी-'यह बूढ़ा बिल्कुल ठीक कह रहा है। जब मनुष्य और कुछ नहीं कर सकता, वह भागने का, पीछा छुड़ाकर पलायन करने का प्रयास करता है।'

बादशाह के पास एक बहुत तेज दौड़ने वाला घोड़ा था। उसने घोड़ा मंगाकर बुद्धिमान लोगों से कहा-'मैं तो अब कहीं दूर जा रहा हूं और यदि जीवित लौटा, तो तुम लोग तय कर मुझे अपना निर्णय बतलाना, पर फिलहाल तो मैं अब जा रहा हूं।'

वह बहुत खुश-खुश जितनी तेजी से हो सकता था, घोड़े पर उड़ा चला जा रहा था क्योंकि आखिर यह जीवन और मौत का सवाल था। वह बार-बार पीछे लौट-लौटकर देखता था कि कहीं वह साया तो साथ नहीं आ रहा है, लेकिन वहां स्वप्न वाले साये का दूर-दूर तक पता न था। वह बहुत खुश था, मृत्यु पीछे नहीं आ रही थी और उससे पीछा छुड़ाकर दूर भागा जा रहा था।

अब धीमे-धीमे सूरज डूबने लगा। वह अपनी राजधानी से कई सौ मील दूर आ गया था। आखिर एक बरगद के पेड़ के नीचे उसने अपना घोड़ा रोका। घोड़े से उतरकर उसने उसे धन्यवाद देते हुए कहा-'वह तुम्हीं हो, जिसने मुझे बचा लिया।'

वह घोड़े का शुक्रिया अदा करते हुए यह कह ही रहा था कि तभी अचानक उसने उसी हाथ को महसूस किया, जिसका अनुभव उसने ख्वाब में किया था। उसने पीछे मुड़कर देखा, वही मौत का साया वहां मौजूद था।

मौत ने कहा-'मैं भी तेरे घोड़े का शुक्रिया अदा करती हूं, जो बहुत तेज दौड़ता है। मैं सारे दिन इसी बरगद के पेड़ के नीचे खड़ी तेरा इन्तजार कर रही थी और मैं चिन्तित थी कि तू यहां तक आ भी पायेगा या नहीं क्योंकि फासला बहुत लंबा था। लेकिन तेरा घोड़ा भी वास्तव में कोई चीज है। तू ठीक उसी वक्त पर यहां आ पहुंचा है, जब तेरी जरूरत थी।'

तुम कहां जा रहे हो? तुम कहां पहुंचोगे? सारी भागदौड़ और पलायन आखिर तुम्हें बरगद के पेड़ तक ही ले जायेगी। और जैसे ही तुम अपने घोड़े या कार को धन्यवाद दे रहे होगे, तुम अपने कंधे पर मौत के हाथों का अनुभव करोगे। मौत कहेगी-'मैं एक लम्बे समय से तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी। अच्छा हुआ, तुम खुद आ गये।'

और प्रत्येक व्यक्ति ठीक समय पर ही आता है। वह एक क्षण भी नहीं खोता। प्रत्येक व्यक्ति ठीक वक्त पर ही पहुंचता है, कोई भी कभी देर लगाता ही नहीं। मैंने सुना है कि कुछ लोग वक्त से पहले ही पहुंच गये, लेकिन मैंने यह कभी नहीं सुना कि कोई देर से आया हो। कुछ लोग, जो समय से पहले पहुंचे थे, वह लोग अपने चिकित्सकों की मेहरबानी के कारण।
अपनी असफलता की वजह उसने यह ठहराई

कि वह काफी तेजी से नहीं दौड़ रहा था।

इसीलिए वह बिना रुके तेज और तेज दौड़ने लगा।

यहां तक कि अन्त में वह नीचे गिर पड़ा और मर गया।

वह यह समझने में असफल रहा

कि यदि उसने सिर्फ किसी पेड़ या किसी छांव की ओर कदम रखे होते,

तो उसकी छाया बनती ही नहीं

और यदि वह उसके नीचे बैठकर स्थिर हो ठहर गया होता,

तो न पैरों के कदम उठते और उनकी ध्वनि होती।

यह बहुत आसान था-सबसे अधिक आसान।

यदि तुम ठीक छाया की ओर बढ़ो, जहां धूप न हो, तो परछाई गायब हो जायेगी क्योंकि परछाई धूप या रोशनी के कारण ही बनती है। वह सूर्य की किरणों की अनुपस्थिति है। यदि तुम एक वृक्ष की छाया तले बैठ जाओ, तो परछाई लुप्त हो जायेगी।

वह यह समझने में असफल रहा

कि यदि उसने सिर्फ किसी पेड़ या किसी छांव की ओर कदम रखे होते,

तो उसकी परछाई बनती ही नहीं। वह गायब हो जाती।

इस छांव को कहते है--मौन। इस छांव को कहते हैं-आंतरिक शान्ति। मन की सुनो ही मत, बस केवल मौन की छांव में सरक जाओ, अपने अंदर गहरे में उतर जाओ, जहां सूर्य की कोई किरण प्रविष्ट नहीं हो सकती, जहां परम शान्ति है।

-ओशो

™ जो अपने आप को बर्बाद करने और अपने घर को उजाड़ने की हिम्मत रखते हैं वही असल मायने में मौजूदा व्यवस्था को बदल सकते हैं। ™

इलाहाबाद में सड़को पर आते-जाते वक़्त कोई न कोई अक्सर किसी कोचिंग वगैरा के ऐड वाला पर्चा पकड़ा देता है। अगर एक घंटे तक यूनिवर्सिटी के आसपास खड़े रहे तो आपको कम से कम 10-12 ऐसे पर्चे जरुर मिल जायेंगे । उन पर्चो से फायदा ये होता है की नए और सस्ते कोचिंग संस्थानों की जानकारी मिल जाती है। एक दूसरा सबसे बड़ा फायदा ये है की अगर आप 10 दिन तक उन पर्चो का संग्रह कर ले तो आपके पास इतना परचा इकठ्ठा हो जायेगा की आप उस पर्चे के दूसरी तरफ के बिना लिखे हुये भाग को बेहतर काम में ले सकते हैं। मसलन, आप चाहे तो उस पर कविता - कहानिया लिख सकते हैं या फिजिक्स, मैथ, कामर्स के न्यूमेरिकल साल्व कर सकते हैं या फिर चित्र वगैरा भी बना सकते हैं। आप तो करेंगे नहीं क्योकि आप तो रुपये पैसे वाले आदमी हैं। यहाँ "आप "का ताल्लुक कमजोर आर्थिक स्थिति वाले जुगाडू छात्रो से है।
उनके लिए अब इस प्रकार के जुगाड़ करना सम्भव नहीं दिख रहा है। कोचिंग वालो के दिमाग में न जाने क्या आ गया है की वो अब पर्चे के दोनों तरफ एड छापवाने लगे हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए , क्योकि इसी बहाने कम से कम कोई उनके पर्चो को लेता तो था। और सबसे बड़ी बात उसका सदुपयोग हो जाता था , उसे इज्जत मिल जाती थी। बाकि लोग तो उसे लेकर रोड पर फेक देते हैं। इससे पेपर भी वेस्ट होता है और सड़के भी गन्दी होती हैं। कोचिंग वालो को ऐसा नहीं करना चाहिए। ;-((