कोएलो लिखते हैं कि मैं रेलवे स्टेशन पर खड़ा अपने एक पब्लिशर के आने का इंतजार कर रहा था। मेरी नजर रेल की पटरियों पर पड़ी, जहां कुछ लोग उसकी मरम्मत कर रहे थे। अचानक एक सवाल दिमाग में दौड़ा। मैंने पास खड़े मजदूरों से पूछा, 'इन पटरियों के बीच दूरी कितनी होगी?' जवाब मिला 143.5 से.मी.।
पाउलो को यह दूरी कुछ अजीब सी लगी। न 150 से.मी., न 145 और न ही 144, आखिर 143.5 ही क्यों? उन्होंने मजदूर से फिर पूछा। इस पर उसने कहा, दरअसल ट्रेन के पहियों के बीच की दूरी इतनी ही होती है। लेकिन पाउलो ने तो इसे दूसरे ढंग से सोचा था। वह बोले, 'तुम्हें नहीं लगता इस दूरी की वजह से ट्रेन के पहियों के बीच की दूरी इतनी है।' स्टेशन वर्कर मुस्कुराया और बोला, 'चीजें ऐसी इसीलिए हैं, क्योंकि वे ऐसी ही हैं।'
यह जवाब पाउलो के दिमाग को शांत नहीं कर पाया। एक टाइम पास सवाल उनकी जिज्ञासा बन चुका था। उन्होंने कई किताबें देखीं, हजारों पन्ने पलटे। हालांकि इस कठिन खोजबीन से उन्होंने कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखी थी। पर आखिरकार जवाब कुछ ऐसा मिला - जब पहली टेन बनी तो उन्हीं टूल्स से बनी, जिनसे उस जमाने में दूसरी गाड़ियां-बग्गियां आदि बनती थीं और उन गाड़ियों के पहियों के बीच की दूरी 143.5 सेमी होती थी।
वह दूरी इतनी इसलिए रखी गई थी, क्योंकि पुरानी सड़कें इसी पैमाने के हिसाब से बनती थीं और यह मेजरमंट दिया था रोड बनाने वाले रोमनों ने। इस माप की वजह थी- लड़ाई में इस्तेमाल होने वाली घोड़ागाड़ी। दरअसल, अगल-बगल दौड़ने वाले घोड़े एक दूसरे के बीच इतनी ही दूरी लेते थे। संभव है कि इस दूरी को बहुत पहले कभी किसी रोमन एक्सपर्ट ने नापा हो और उसकी किस्मत से यह एक एक्सपर्ट माप बन गई, जिसका आज सारी दुनिया पालन करती है।
इस दूरी ने शायद कोई बहुत बड़ा अड़ंगा भी न डाला हो, इसलिए हर कोई इसे अपनाता गया। किसी ने इसे बदलने की कोशिश के बारे में सोचा भी होगा तो शायद इस पंक्ति ने उसे हरा दिया होगा - यह दूरी इतनी ही होती है और यही सही है।
पाउलो की इस रोचक कहानी का एक संदेश है - इसी तरह हमारी जिंदगी के रास्ते भी तय होते हैं। जीवन में कई चीजें बदलाव चाहती हैं, लेकिन यह सोच कि यही चला आ रहा है, हमें एक ही ढर्रे की जिंदगी जीने पर मजबूर करती है। बदलाव के लिए चाहिए हिम्मत - सोचने की और उस सोच पर अमल करने की।
तमाम वैज्ञानिकों, कलाकारों, लेखकों की हिम्मत का ही नतीजा है कि हम रोज एक बेहतर दुनिया में जी रहे होते हैं। लेकिन दुनिया में एक बड़ा हिस्सा वह है, जो यह हिम्मत नहीं कर पाता है। दसवीं के बाद हमारे पास मैथ्स छोड़ने का ऑप्शन होता है, लेकिन हम नहीं छोड़ते क्योंकि हमारे परिचित सीनियर्स ने ऐसा नहीं किया और न हमारे दोस्त ऐसा कर रहे हैं। हमें डर होता है कि ऐसा करने पर समाज की नजरों में हम कमजोर साबित हो जाएंगे। और इस वजह से हम उसे झेलते हैं - 2, 5, 7 साल या जिंदगी भर। क्या जरूरी है कि हम डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, साइंस, कॉमर्स या इकनॉमिक्स ही पढ़ें, क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि ऐसा सारी दुनिया सोचती है?
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