Sunday, May 19, 2013

एक शायरी ...!!!

मंजूर नहीँ बंधन कोई,
उन्मुक्त गगन मेँ उड़ता हुँ.
वो नफरत की बातेँ करते,
मैँ छँद प्रेम के गढ़ता हूँ..

मानवता है पहचान मेरी,
मजहब से नहीँ मरासिम है,
वो नाम खुदा का लेते हैँ
मैँ काफिर बन के रहता हूँ...

ग़र राह कठिन आ जाए तो,
कठिनाई से क्या घबराना,
वो गैरोँ के पथ के राही
मैँ अपनी राह पे चलता हूँ...

आईना बन कर रहने पर,
पत्थर तो सहना होगा ही,
लेकिन मुझको परवाह नहीँ,
मैँ बात जो सच्ची कहता हूँ..

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