जिसे तुम अपनी मोहब्बत में बर्बाद कहते हो,
उसी के दिल में तुम आज भी आबाद रहते हो..!
भले ही इल्म न हो अब तुम्हे मेरी मोहब्बत का ,
नफ़स (सांस) में आज भी तुम खुशबू बन के महकते हो..!
मेरी चाहत की सतायिश (प्रसंशा) तुम करते थे रात-दिन,
मुखालिफ (विरोधी) बन के अब क्यों इतना मुझसे दूर रहते हो.!
इतनी रुसवाईयाँ अब बाखुदा अच्छी नहीं लगती,
किसी के इश्क में लगता है अब मगरूर रहते हो।
तुम्हारे जाने के बाद जिंदगी ज़ुल्मत (अँधेरा) में ठहरी है,
तुम हो के अब गैरो के घर का नूर (प्रकाश) रहते हो..!
कभी मौका मिले तो देखना इस दिल की महफ़िल को,
जहाँ की हर दर-ओ-दिवार में बस तुम ही रहते हो..!
मेरी उम्मीद मेरा हौसला बाकि न अब रहा,
बताओ किस तरह मर कर भी तुम जिन्दा से रहते हो..!
दो-चार बातों-मुलाकातोंका शायद सिलसिला ही था,
"विजय" पागल हो जिसको आज भी तुम इश्क कहते हो.
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