क्रिस्तोफ़ किस्लोव्स्की -
हम बेहद ग़रीब परिवार से थे।
मेरे पिताजी सिविल इंजीनियर थे
और मेरी मां ऑफि़स में क्लर्क
थीं। मेरे पिताजी को टीबी थी और
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बारह
साल तक वह हर पल उससे जूझते हुए
मरते रहे। उन्हें बार-बार
सैनिटोरियम भेजा जाता था।
चूंकि हम, यानी मेरी मां,
मेरी बहन और मैं उनके क़रीब
रहना चाहते थे, हम उनके साथ-साथ
चले जाते। जिस शहर के सैनिटोरियम
में उन्हें भर्ती कराया जाता,
मेरी मां उसी शहर के किसी दफ्तर
में नौकरी कर लेतीं। जब उन्हें
दूसरे शहर के सैनिटोरियम में
भेजा जाता, हम भी उनके साथ दूसरे
शहर चले जाते। मां उस नए शहर में
अपने लिए नौकरी खोज लेती।
बचपन में मेरे फेफड़े भी बेहद
कमज़ोर थे। हमेशा यह
आशंका बनी रहती कि मुझे
भी टीबी हो जाएगी। दूसरे
बच्चों की तरह मैं भी फुटबॉल खेल
लेता या साइकिल चला लेता, लेकिन
ज़्यादातर समय मैं बीमार रहता,
इसलिए मुझे कंबल या चादर ओढ़ाकर
बरामदे में लिटा दिया जाता था।
बरामदे या आंगन में इसलिए
ताकि मेरे
फेफड़ों को ताज़ा हवा मिलती रहे।
ऐसे में मेरे पास काफ़ी समय
होता। मैंने उस समय का इस्तेमाल
पढऩे के लिए किया। जब मुझे ठीक
से पढऩा नहीं आता था,
मेरी मां मुझे किताबें पढ़कर
सुनाया करती थी। बहुत जल्द मैंने
पढऩे की शुरुआत कर दी। मैं बहुत
तेज़ पढ़ता था। मैं रात को छोटी-
सी टॉर्च
या मोमबत्ती की रोशनी में भी पढ़
लेता था। अक्सर चादर के भीतर
मुंह ढांपकर। सुबह तक उसी तरह
पढ़ता रहता।
जिस दुनिया में मैं रहता था,
उसमें दोस्त थे, साइकिलें थीं,
यहां-वहां भटक आना भी था। पर
मेरे लिए
किताबों की दुनिया भी उतनी ही असल
थी। ऐसा नहीं कि मेरे पास सिर्फ़
कामू और दोस्तोएव्स्की ही थे, ये
तो मेरी दुनिया का एक हिस्सा-भर
थे। उस दुनिया में काउबॉयज़
भी थे और देसी नायक भी। मैं
अच्छा साहित्य
भी उतनी ही रुचि से पढ़ता था,
जितना कि ख़राब साहित्य। आज
भी मैं यह साफ़-साफ़
नहीं बता सकता कि मैंने
दोस्तोएव्स्की से
ज़्यादा सीखा है या अमेरिका के
किसी थर्ड-रेट जासूसी कथा लेखक
से। मैं ऐसा कोई अंतर
जानना भी नहीं चाहता। लंबे समय
तक मैं यह
मानता रहा कि दुनिया में भौतिक
चीज़ों के अलावा कुछ चीज़ें
ऐसी भी होती हैं, जिन्हें आप छू
नहीं सकते या दुकानों में ख़रीद
नहीं सकते। किताबें
पढऩा ऐसा ही एक अनुभव है।
मेरे लिए मेरे
पिता ज़्यादा महत्वपूर्ण थे,
बजाय मां के, क्योंकि पिता बहुत
जल्दी चल बसे थे। लेकिन आज मैं यह
कह सकता हूं
कि मेरी मां भी उतनी ही महत्वपूर
थी, क्योंकि वही मुख्य कारण
थी कि मैं फिल्म स्कूल गया और
फिल्म लाइन में आया।
फिल्म स्कूल की प्रवेश
परीक्षा मैंने दूसरी बार दी थी।
उसके बाद ऐसी घटना घटी, जिसने
मेरी महत्वाकांक्षाओं को आग
की तरह भड़का दिया। परीक्षा के
बाद मैं घर आया। मां को फ़ोन
किया और तय किया कि हम वारसा में
चौराहे की सीढिय़ों के पास
मिलेंगे। मां को बहुत उम्मीदें
थीं कि मैं फिल्म स्कूल में
दाखि़ला ले लूंगा। मेरा करियर बन
जाएगा। हमारी समस्याएं दूर
हो जाएंगी। पर मुझे पता था कि मैं
दूसरी बार भी फेल हो चुका हूं।
वह सीढिय़ों पर ऊपर की तरफ़ से
पहुंची और मैं नीचे की तरफ़ से।
मैं चलते-चलते उसके पास पहुंचा।
मूसलाधार बरसात हो रही थी।
वहीं खड़े-खड़े मां पूरी तरह भीग
गईं। फिल्म स्कूल की प्रवेश
परीक्षा में मैं दूसरी बार
भी फेल हो गया था, यह जानकर वह
बेहद दुखी और निराश थीं।
उन्होंने बेहद अफ़सोस के साथ
कहा, 'शायद तुम फिल्मों के लिए
बने ही नहीं हो।'
मुझे नहीं पता, वह
रो रही थीं या बारिश के कारण
उनका चेहरा व आंखें गीली थीं,
लेकिन उन्हें इतना दुखी देखकर
मैं उनसे
भी ज़्यादा दुखी हो गया।
वही क्षण था, जब मैंने यह तय किया,
चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए,
अब मैं फिल्म स्कूल में
दाखि़ला लेकर ही रहूंगा। अब मैं
पूरी दुनिया के सामने यह साबित
करके रहूंगा कि मैं सिर्फ़ और
सिर्फ़ फि़ल्मों के लिए
ही बना हूं। सिर्फ़ इसलिए
कि बहुत दुखी होकर मेरी मां ने
वह बात कही थी। ठीक उसी क्षण
मैंने वह फ़ैसला किया था।
बरसों बाद एक महोत्सव में
पत्रकार सारे निर्देशकों से
सवाल कर रहे थे कि अगर वे फिल्म न
बनाते, तो क्या करते? सबने ख़ूब
जवाब दिए। मेरी बारी आई, तो मुझे
वारसा के उस चौराहे पर
खड़ी मां का दुखी चेहरा याद आ
गया। मैंने जवाब दिया,
'क्योंकि मुझे कोई दूसरा काम
नहीं आता। क्योंकि मैं
फिल्मों के लिए ही बना हूं।'
वहां उपस्थित फिल्मकारों में यह
सबसे छोटा जवाब था, इसीलिए यह उस
समय की सुर्खी़ बन गया।
पर सच तो यह है कि मैं आज तक
नहीं जानता, उस रोज़
मां रो रही थी या बारिश
हो रही थी।
Saturday, October 5, 2013
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