" झुल्लन की मेहरारु "
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टिकुली लगा के जब आईना निहारती है झुल्लन कि मेहरारू
तो दिल मुस्किया के हंस देता है...
झुल्लन की मेहरारू का जाने
ओकरे फेर में हम देवाल में केतना मुक्का कर दिए
कि झाँक सकें , निहार सके
बिल से अपना नज़र में अ नज़र से दिल में उतार सकें ..
ओकरी सूरत , ओकरी काया ..
हमार झुल्लन की मेहरारू !
हमार झुल्लन की मेहरारू का जाने
कि जब गोबर फेंकने जाती है
तो ओकरा हथेली पे हाथ पाथने को जी करता है
दउरी से गोबर नहीं गुलाब का खुसबू आता है
हम भित्तर ही भित्तर गमगमा जाते हैं
अ इ सोच-सोच के कसमसा उठते हैं कि घूर
के जगह दिल होता
अ गोबर की जगह प्रेम तो
अब तक पहाड़ बन गया होता
अ हम बीच से कहीं माझी क सड़क
निकार देते.
हमार झुल्लन की मेहरारू !
हमार झुल्लन की मेहरारू जब कपड़ा कचारती है
तो देख के दिमाग सुन्न हो जाता है
अ लौटती है जब चेतना तब एही सोच के
पछताते हैं कि खपड़ा से अच्छा
आठ - दस जोड़ी कपडा ही कीन लेते
तो झुल्लन की मेहरारू दिनभर फीचती
हम भीगते रात की बारिश में
भीतर अ बाहर से..
फीचे जाते इधर उधर से
अ सुबह ओकरा जइसन साफ़ अउर चिक्कन हो जाते..
हमार झुल्लन की मेहरारू !
जब निहारते हैं ओका दूध पिलाते हुए झुल्लन की बिटिया को
हमको याद आ जाती है हमार माई ..
केतना नेह से भरी थी
केतना प्यारी थी
माई को सोच के मुस्किया देते हैं अ
याद करते हैं
कि जब ओकरा पेट में मुंह सटा के पुर्र पुर्र पादने वाली आवाज़ निकालते थे
तो कईसे ऊ हँस के हमको सीने से लगा लेती थी...
केतना नेह से भरी है
झुल्लन की मेहरारु
कि बिटिया जब काटती है तो सी सी कर के मुस्किया देती है
अ अपना छाती से चिपका के माथे पे
पुच्च पुच्च चार गो चुम्मा धर देती है
हम इ सोच के रह जातें है कि
हमको मिलता एतना नेह तो केतना खुश होती
हमार माई.
ऊपर से मुस्कियाती के हमरा बचवा अकेला नहीं है
हमार झुल्लन की मेहरारु !
हमार झुल्लन की मेहरारू जब मार खाती है तो
ओकरा चीख हमरे कानो को बेध देती है .
हम रो पड़ते हैं फफक के ...
अ जब बाप चीखता है
के भोसडी के अब नींद में चिहूको तो फल्ट्ठा से पीटेंगे
त हम चुप हो जाते हैं
अ कोसते हैं अपने बाप को ..
झुल्लन को ..
दउवा को ...
केतना जुल्मी है रे तू
उठाना था तो झुल्लनवा को उठाता
हमरे बाप को उठाता
काहे छीन लिया हमरी माई को
झुल्लन की मेहरारु को
हमार झुल्लन की मेहरारु !
हमार झुल्लन की मेहरारु तू फिकिर ना करो
हम रोज दऊ से जुगाड़ भिडाते हैं
सोम्मार भोला क गोला ,
मंगर बजरंग बली क ब्रत
बुध गणेश क लड्डू
बेफे फेर भोला क चिलम
शुक्क मज़ार पे मुर्गा
शनिच्चर सौ ग्राम तेल चढ़ाते है
अ अतवार
अतवार भुख्खै बिताते हैं
कि कौन देवता होगा इस दिन का त खुस हो जाएगा
किरपा करेगा...
तू सबर करना हमार झुल्लन की मेहरारु
एह जनम न सही अगले जनम हम मिलेंगे
साथ में माई भी होगी
अ नहीं होगा कौनो बाप
कौनो झुल्लन ..
हमार झुल्लन की मेहरारु ..
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