जर्मन ग्रेयर स्त्रियों की साज-सज़्ज़ा को हिकारत की नज़र से देखती थी और उसे पित्रसत्ता से प्रेरित मानती थी । अपनी पुस्तक The Female Eunch में वो लिखती हैं कि स्त्री गंधहीन और रोमविहीन होने के लिए जिस कदर आसक्त रहती है , उसमें भारी विडंबना नज़र आती है । एक तरफ वो सिर पर केश का अंबार लिए रहती है तो दूसरी तरफ रोमविहीन भी बनी रहना चाहती है । एक तरफ वह अपनी मूल गंध छिपाने के लिए शरीर में कृत्रिम गंध का तालाब समाए फिरती है तो दूसरी तरफ एकांत में अपनी गंध भी ढूंढती है । शारीरिक सौष्ठव की बात करें तो वह अपने स्तनों को बांधे भी रखती है और उसकी आज़ादी भी चाहती है । वह कमर, नितंब और योनि की बेहतरी भी चाहती है और आकार-प्रकार के फेर में बेहतरी को नज़रंदाज़ भी करती है । कुल मिलाकर इन सबमें घोर विडंबना व्याप्त नज़र आती है ।
मेकअप या कृत्रिम सौंदर्य इसी विडंबना से उपजा प्रतीत होता है । लेकिन यह उक्त स्थितियों से थोड़ा अलग है । आज के दौर की स्त्री पुरुषों के बनाये सौंदर्य प्रतिमानों की इतनी अभ्यस्त है कि वह कृत्रिमता को ही सत्य मानती है । कृत्रिम सौंदर्य उसकी जरूरत और आदत बन चुका है । बाजार ने भी इसे आम जीवन और संस्कृति का हिस्सा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । यह बाजार की गोद में फलफूल रहे कृत्रिम सौंदर्य का चरम ही है कि उसका विस्तार पुरुषप्रधान समाज के आम पुरुषों तक भी हो चुका है । इसके प्रकोप से मानव जाति के दोनों लिंग के हर आयुवर्ग के लोग पीड़ित होते जा रहे हैं ।
आप सोच रहे होंगे इसके भला क्या नुकसान है ? यह तो हमें आकर्षक और सुंदर ही बनता है ।
लेकिन ऐसा नहीं है । यह कथित रूप से सिर्फ कुछ लोगों को आकर्षक और सुंदर बना रहा है वो भी अपने बनाये मापदंडों पर । इन्ही मापदंडों के आधार पर बाकी लोगों को यह कुरूप भी घोषित कर रहा है । उन्हें हीन और कमतर दिखा रहा है । अपने इस रूप में यह न सिर्फ मानव जाति की मूल प्रकृति बल्कि उसकी सहजता और सौंदर्यबोध को भी बुरी तरह से नष्ट कर रहा है ।
जर्मन ग्रेयर के शब्दों में कहा जाए तो इस भयावह समस्या का एक ही हल है .." साफ-सुथरी , पाली-पोसी गयी देह - चाहे वह स्त्री की हो या पुरुष की "
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