मूक/बधिर ओलंपिक में वीरेंद्र का तीसरी बार गोल्ड..
फेमस रेसलर सुशील कुमार ने अपने एक इंटरव्यू में वीरेंद्र सिंह यादव का जिक्र किया था । उन्होंने बताया था कि वीरेंद्र ऐसा पहलवान है जिसे हराना नामुमकिन है । वो वीरेंद्र से पांच बार भिड़े लेकिन उन्हें हरा नहीं पाये । सभी मैच ड्रॉ ही रहे।
कौन है ये वीरेंद्र सिंह यादव ?
वीरेंद्र वो शख्श है जिनके कारण ही भारत के लिए डीफगेम्स ने दरवाज़े खोल दिए । उन्ही की वजह से भारत पहली बार deaflympics यानी मूक/बधिर ओलंपिक में भाग ले सका और वहां भारतीय खिलाड़ी भेजने की परंपरा शुरू हुई । वीरेंद्र पर एक “गूंगा पहलवान” नाम से छोटी फिल्म भी बनाई गई है।
वीरेंद्र उस समय चर्चा में आये जब वो 2002 में नेशनल चैम्पियनशिप में टॉप-3 में पहुंचे । लेकिन इंटरनेशनल चैम्पियनशिप के लिए उनका सिलेक्शन नहीं हुआ। वे दुखी हुए पर लगे रहे । उन्होंने हार नहीं मानी । बाद में उन्होंने डीफलिंपिक्स 2005 (मेलबर्न) में भारत को गोल्ड दिलाया ।
बीच में उनका प्रदर्शन कुछ समय के लिए ठीक नहीं रहा । 2009 के ओलंपिक में उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा । पर 2013 (बुल्गारिया) ओलंपिक में वापसी करते हुए उन्होंने भारत को फिर से गोल्ड दिलाया ।
गोल्ड जीतने का यह सिलसिला अब भी जारी है । इस बार 2017 के ओलंपिक में 26 जुलाई को उन्होंने तीसरी बार भारत के लिए गोल्ड जीता ।
वीरेंद्र बताते हैं कि कुश्ती का जुनून उन्हें अपने पिता से मिला । उनके पिता को कुश्ती बेहद पसंद थी । वो वीरेंद्र को बचपन से ही अखाड़े में भेजते थे ।
शुरुआत में अखाड़े में दूसरे पहलवान उनकी शारीरिक विकलांगता का मजाक उड़ाते थे । वीरेंद्र जब वर्जिश करते तो लोग ताना कसते- 'देख गूंगा भी पहलवान बनेगा।' लेकिन वे अखाड़े में कोच के होठों की फड़कन और पहलवानों को देखकर दांव-पेंच के पैंतरे सीखने लगे । उन्होंने लोगो की बातों की परवाह किये बिना मेहनत की और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई ।
मैं टीवी नहीं देखता इसलिए मुझे पता नहीं है कि टीवी पर वीरेंद्र के बारे में कुछ आया या नहीं । पर भारत उम्मीद के सहारे चलने वाला , उम्मीद पर टिका देश है तो मैं उम्मीद कर सकता हूँ कि यहां कभी न कभी वीरेंद्र जैसे खिलाड़ियों की भी सुध ली जाएगी । उनकी बिना शब्दो की कही बातें सुनी जाएंगी । लोगो तक पहुचाई जाएंगी । उनको मिलने वाली सुविधाओ और उपलब्ध संसाधनों पर दो पल के लिए नज़र डाली जाएगी । ताकि भारत में मूक / बधिर खिलाड़ियों को भी अन्य दिव्यांग खिलाड़ियों की तरह सुविधा मिलने लगे । अभी दिव्यांग होने के बावजूद भी उन्हें अन्य खिलाड़ियों की तरह सुविधा नहीं मिलती है ।
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